मौलिक अधिकार और मानवाधिकार दोनों ही व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करते हैं, लेकिन दोनों एक जैसे नहीं हैं। इनकी उत्पत्ति, क्षेत्र और लागू करने की प्रक्रिया अलग-अलग होती है।
मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो हर व्यक्ति को केवल मानव होने के कारण प्राप्त होते हैं। ये अधिकार सार्वभौमिक होते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त होते हैं। इनमें नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार शामिल हैं।
मौलिक अधिकार वे अधिकार हैं जो किसी देश के संविधान द्वारा दिए जाते हैं। भारत में मौलिक अधिकार संविधान के भाग III में दिए गए हैं और ये न्यायालय द्वारा लागू किए जा सकते हैं।
दोनों में समानता यह है कि दोनों व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं। दोनों राज्य की शक्ति को सीमित करते हैं और व्यक्ति को मनमानी से बचाते हैं।
अंतर यह है कि मानवाधिकार का क्षेत्र व्यापक है, जबकि मौलिक अधिकार मुख्यतः नागरिक और राजनीतिक अधिकारों तक सीमित हैं।
मानवाधिकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हैं, जबकि मौलिक अधिकार राष्ट्रीय स्तर पर।
मौलिक अधिकारों को न्यायालय में लागू किया जा सकता है, जबकि मानवाधिकारों को लागू करना कभी-कभी कठिन होता है।
भारत में दोनों के बीच मजबूत संबंध है। कई मौलिक अधिकार मानवाधिकारों से प्रेरित हैं।
न्यायपालिका ने मौलिक अधिकारों का विस्तार कर उन्हें मानवाधिकारों से जोड़ा है।
नीति निदेशक तत्व भी मानवाधिकारों को दर्शाते हैं।
मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत NHRC की स्थापना की गई।
दोनों के बीच संबंध पूरक (complementary) है। मानवाधिकार नैतिक आधार देते हैं, जबकि मौलिक अधिकार कानूनी सुरक्षा देते हैं।
अंत में, दोनों मिलकर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करते हैं और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करते हैं।