मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता (universality) एक मूलभूत सिद्धांत है, जिसका अर्थ है कि मानवाधिकार सभी लोगों पर, हर जगह और हर समय समान रूप से लागू होते हैं। यह सिद्धांत कहता है कि हर व्यक्ति को केवल मानव होने के कारण समान अधिकार प्राप्त हैं।
यह सिद्धांत मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR), 1948 में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है, जिसमें कहा गया है कि सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान गरिमा के साथ जन्म लेते हैं।
सार्वभौमिकता का आधार मानव गरिमा है। यह मानता है कि सभी मनुष्यों का मूल्य समान है और इसलिए उन्हें समान अधिकार मिलने चाहिए।
इस सिद्धांत का एक प्रमुख लाभ यह है कि यह एक वैश्विक मानक प्रदान करता है। यह सुनिश्चित करता है कि सभी देशों को न्यूनतम अधिकारों का सम्मान करना होगा।
यह समानता को बढ़ावा देता है और भेदभाव को समाप्त करता है। यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म या लिंग के आधार पर भेदभाव न हो।
यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी बढ़ावा देता है और मानवाधिकारों के संरक्षण में मदद करता है।
हालांकि, इस सिद्धांत की आलोचना भी की जाती है। सबसे बड़ी आलोचना सांस्कृतिक सापेक्षवाद (cultural relativism) की है। इसके अनुसार, मानवाधिकारों को प्रत्येक समाज की संस्कृति और परंपराओं के अनुसार समझा जाना चाहिए।
कुछ लोग कहते हैं कि सार्वभौमिक मानवाधिकार पश्चिमी विचारधारा पर आधारित हैं और सभी देशों पर लागू नहीं हो सकते।
कुछ समाजों में सामूहिक हित को व्यक्तिगत अधिकारों से अधिक महत्व दिया जाता है।
एक अन्य आलोचना यह है कि आर्थिक रूप से कमजोर देश सभी अधिकारों को लागू नहीं कर सकते।
कुछ देशों द्वारा मानवाधिकारों का राजनीतिक उपयोग भी किया जाता है, जिससे विवाद उत्पन्न होता है।
फिर भी, सार्वभौमिकता एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है क्योंकि यह सभी लोगों के लिए न्यूनतम सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
एक संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है, जिसमें सार्वभौमिकता और सांस्कृतिक विविधता दोनों का सम्मान किया जाए।
1993 की वियना घोषणा भी इसी संतुलन का समर्थन करती है।
भारत में संविधान में भी सार्वभौमिकता का सिद्धांत देखा जा सकता है, साथ ही सांस्कृतिक विविधता का सम्मान भी किया गया है।
अंत में, मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता समानता और न्याय को बढ़ावा देती है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए संतुलन आवश्यक है।