मानव अधिकारों को सार्वभौमिक (Universal) माना जाता है, जिसका मतलब है कि ये सभी लोगों पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उनकी राष्ट्रीयता, धर्म, लिंग या संस्कृति कुछ भी हो।
यह विचार सार्वभौमिक मानव अधिकार घोषणा (UDHR) से आता है, जिसमें कहा गया है कि सभी मनुष्य जन्म से स्वतंत्र और समान हैं।
सार्वभौमिकता का अर्थ है:
सभी के लिए समान अधिकार
जन्म से प्राप्त अधिकार
सरकार की अनुमति पर निर्भर नहीं
यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।
लेकिन इस पर बहस भी होती है। कुछ लोग कहते हैं कि विभिन्न संस्कृतियों के अनुसार अधिकारों की व्याख्या अलग हो सकती है।
इसे सांस्कृतिक सापेक्षता (Cultural Relativism) कहा जाता है।
फिर भी, अंतरराष्ट्रीय कानून सार्वभौमिकता का समर्थन करता है क्योंकि जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा जैसे अधिकार हर जगह समान होने चाहिए।
भारत में भी मानव अधिकार सार्वभौमिक माने जाते हैं क्योंकि संविधान सभी को समानता और गरिमा देता है।
अंत में, सिद्धांत रूप में मानव अधिकार सार्वभौमिक हैं, लेकिन उनका पालन देशों के अनुसार अलग हो सकता है।