केल्सन के शुद्ध विधि सिद्धांत का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए
हैंस केल्सन 20वीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण विधि दार्शनिकों में से एक थे। उन्होंने “Pure Theory of Law” अर्थात “शुद्ध विधि सिद्धांत” प्रस्तुत किया। उनका मुख्य उद्देश्य कानून को एक शुद्ध विज्ञान के रूप में स्थापित करना था। उनका मानना था कि कानून का अध्ययन नैतिकता, राजनीति, धर्म, समाजशास्त्र या व्यक्तिगत विचारों से अलग करके किया जाना चाहिए।
केल्सन के अनुसार कानून एक “नियमों की प्रणाली” (System of Norms) है। कानून यह नहीं बताता कि क्या अच्छा है या बुरा है। कानून यह बताता है कि क्या वैध (Valid) है और क्या अवैध (Invalid) है।
उन्होंने कहा कि कानून को “शुद्ध” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें किसी प्रकार की बाहरी विचारधाराओं को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। कानून को नैतिकता से अलग रखना चाहिए।
उनका सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है “Hierarchy of Norms” अर्थात नियमों का क्रमबद्ध ढांचा। इसके अनुसार प्रत्येक नियम अपनी वैधता किसी उच्च नियम से प्राप्त करता है।
यह क्रम ऊपर की ओर चलता रहता है और अंत में एक सर्वोच्च नियम पर समाप्त होता है जिसे उन्होंने “Grundnorm” या “मूल मानक” कहा।
Grundnorm कोई लिखित नियम नहीं है। यह एक काल्पनिक (Hypothetical) आधार है जिसे मान लिया जाता है।
भारत में इस संरचना को इस प्रकार समझा जा सकता है:
संविधान सर्वोच्च है।
कंपनी अधिनियम, 2013 संविधान के अंतर्गत बनाया गया है।
कंपनी अधिनियम के अंतर्गत नियम बनाए जाते हैं।
कंपनी के आंतरिक नियम (Articles) अधिनियम के अधीन होते हैं।
यह स्पष्ट रूप से केल्सन के पिरामिड सिद्धांत को दर्शाता है।
केल्सन ने यह भी कहा कि कानून एक “Coercive System” है अर्थात इसमें दंड का प्रावधान होता है।
उदाहरण के लिए, यदि कोई कंपनी धारा 92 के अंतर्गत वार्षिक रिटर्न दाखिल नहीं करती, तो उस पर दंड लगाया जाता है। यह दंड कानून का आवश्यक भाग है।
उन्होंने “Is” और “Ought” के बीच अंतर किया।
“Is” का अर्थ है तथ्य।
“Ought” का अर्थ है क्या किया जाना चाहिए।
कानून “Ought” की दुनिया से संबंधित है।
उदाहरण:
“Company shall file annual return.”
यह तथ्य नहीं है। यह निर्देश है।
महत्व
केल्सन का सिद्धांत महत्वपूर्ण है क्योंकि:
यह कानून की वैधता को स्पष्ट करता है।
यह बताता है कि निम्न कानून उच्च कानून के विपरीत नहीं हो सकता।
यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) को समझने में सहायता करता है।
यह संविधान की सर्वोच्चता को स्थापित करता है।
कंपनी अधिनियम में प्रयोग
धारा 6 स्पष्ट करती है कि यदि अधिनियम और कंपनी के Articles में विरोध हो, तो अधिनियम प्रभावी होगा।
यह केल्सन की पदानुक्रम प्रणाली को दर्शाता है।
Doctrine of Ultra Vires भी इसी सिद्धांत पर आधारित है।
यदि कंपनी अपने Memorandum से बाहर जाकर कार्य करती है, तो वह कार्य शून्य होगा।
आलोचना
नैतिकता की अनदेखी
कानून को पूरी तरह नैतिकता से अलग नहीं किया जा सकता।
धारा 166 (निदेशकों के कर्तव्य) में “good faith” का उल्लेख है। यह नैतिक अवधारणा है।
Grundnorm काल्पनिक है
यह लिखा नहीं है, केवल माना गया है।
सामाजिक वास्तविकता की उपेक्षा
CSR (धारा 135) सामाजिक अपेक्षा के कारण लाई गई।
न्याय की उपेक्षा
कानून केवल वैधता नहीं, न्याय भी महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
केल्सन का शुद्ध विधि सिद्धांत कानून को एक संरचित और वैज्ञानिक रूप में समझाता है। यद्यपि इसकी आलोचना हुई है, फिर भी यह संवैधानिक सर्वोच्चता और विधि की वैधता को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।