विधिशास्त्र के ऐतिहासिक विद्यालय पर चर्चा कीजिए
ऐतिहासिक विद्यालय (Historical School) विधिशास्त्र का एक महत्वपूर्ण विचारधारा समूह है, जिसका विकास 19वीं शताब्दी में हुआ। यह विद्यालय प्राकृतिक विधि (Natural Law) के विरोध में उत्पन्न हुआ। जहाँ प्राकृतिक विधि यह कहती थी कि कानून तर्क और सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों पर आधारित है, वहीं ऐतिहासिक विद्यालय ने कहा कि कानून तर्क या अचानक बनाई गई विधायिका का परिणाम नहीं है, बल्कि यह समाज के इतिहास, परंपराओं और रीति-रिवाजों से धीरे-धीरे विकसित होता है।
इस विद्यालय का मुख्य सिद्धांत यह है कि कानून समाज का उत्पाद है। यह समाज के साथ विकसित होता है। इसे राज्य द्वारा अचानक बनाया नहीं जाता, बल्कि यह लोगों के जीवन से उत्पन्न होता है।
इस विद्यालय के प्रमुख विचारक फ्रेडरिक कार्ल वॉन साविनी (Savigny) थे। साविनी ने कहा कि कानून भाषा की तरह विकसित होता है। जैसे भाषा लोगों के बीच स्वाभाविक रूप से विकसित होती है, वैसे ही कानून भी लोगों की सामाजिक चेतना से उत्पन्न होता है।
साविनी ने “Volksgeist” की अवधारणा दी। Volksgeist का अर्थ है “जन-आत्मा” या “लोगों की सामूहिक चेतना”। उनके अनुसार कानून जनता की सामूहिक भावना और विचारों का प्रतिबिंब है।
इसका अर्थ है कि कानून समाज की संस्कृति, परंपरा और इतिहास से जुड़ा होना चाहिए। यदि कानून समाज के इतिहास को नजरअंदाज करके बनाया जाए, तो वह सफल नहीं होगा।
भारत में कंपनी कानून इसका उदाहरण है। कंपनी कानून अचानक नहीं बना। यह ब्रिटिश कंपनी कानून से विकसित हुआ। पहले कंपनी अधिनियम, 1956 था। बाद में आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों के कारण कंपनी अधिनियम, 2013 लागू किया गया। यह दर्शाता है कि कानून समय के साथ बदलता है।
ऐतिहासिक विद्यालय का मानना है कि विधायिका को कानून बनाते समय समाज की परंपराओं और रीति-रिवाजों का सम्मान करना चाहिए।
साविनी ने जर्मनी में तत्काल कानून संहिताकरण (Codification) का विरोध किया था। उनका मानना था कि जब तक कानून समाज में पूरी तरह विकसित न हो जाए, तब तक उसे संहिताबद्ध नहीं करना चाहिए।
इस विद्यालय के एक अन्य महत्वपूर्ण विचारक सर हेनरी मेन (Henry Maine) थे। उन्होंने कहा कि समाज का विकास “Status से Contract” की ओर हुआ है।
प्राचीन समाज में व्यक्ति की कानूनी स्थिति जन्म और परिवार से तय होती थी। आधुनिक समाज में व्यक्ति के अधिकार और कर्तव्य अनुबंध (Contract) से तय होते हैं।
कंपनी कानून में यह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। पहले व्यापार पारिवारिक आधार पर होता था। आज कंपनियाँ अनुबंधों और कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर बनती हैं।
ऐतिहासिक विद्यालय यह भी कहता है कि न्यायाधीश कानून को मनमाने ढंग से नहीं बनाते। वे समाज की परंपराओं और ऐतिहासिक विकास को ध्यान में रखकर व्याख्या करते हैं।
कंपनी अधिनियम, 2013 में ऐतिहासिक विकास
धारा 135 (CSR) सामाजिक अपेक्षाओं के कारण जोड़ी गई।
धारा 166 (निदेशकों के कर्तव्य) आधुनिक कॉर्पोरेट नैतिकता को दर्शाती है।
धारा 241–242 (दमन और कुप्रबंधन) अल्पसंख्यक हितों की रक्षा के लिए विकसित की गई।
ये सभी प्रावधान दिखाते हैं कि कंपनी कानून समय के साथ विकसित हुआ।
ऐतिहासिक विद्यालय के लाभ
कानून को समाज से जोड़ता है।
कानून के प्राकृतिक विकास को समझाता है।
स्थिरता प्रदान करता है।
मनमानी विधायिका को रोकता है।
आलोचना
विधायिका की भूमिका को कम महत्व देता है।
सुधार की गति धीमी हो सकती है।
Volksgeist स्पष्ट नहीं है।
पुराने और अन्यायपूर्ण रीति-रिवाजों को बढ़ावा मिल सकता है।
निष्कर्ष
ऐतिहासिक विद्यालय हमें सिखाता है कि कानून समाज के साथ विकसित होता है। साविनी का Volksgeist और मेन का Status से Contract सिद्धांत कानून के विकास को समझने में सहायक है। यद्यपि इसकी आलोचना हुई है, फिर भी कंपनी कानून और अन्य विधियों के ऐतिहासिक विकास को समझने में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।