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Can law exist without sovereign? Critically analyze.

यह प्रश्न मुख्य रूप से जॉन ऑस्टिन के सिद्धांत से संबंधित है। ऑस्टिन के अनुसार कानून संप्रभु का आदेश है जो दंड से समर्थित होता है। इसलिए उनके अनुसार यदि संप्रभु नहीं है, तो कानून भी नहीं है।

ऑस्टिन ने संप्रभु को एक निश्चित मानव श्रेष्ठ बताया, जिसे समाज का अधिकांश भाग आदतन मानता है और जो स्वयं किसी अन्य की आज्ञा का पालन नहीं करता। इस दृष्टिकोण से कानून और संप्रभु एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

परंतु कई विधिशास्त्रियों ने इस विचार की आलोचना की है।

पहला तर्क – प्रथागत कानून (Customary Law)

प्राचीन और जनजातीय समाजों में कोई स्पष्ट संप्रभु नहीं था। फिर भी लोग परंपरागत नियमों का पालन करते थे। ये नियम समाज में बाध्यकारी थे। इसलिए कहा जा सकता है कि कानून संप्रभु के बिना भी अस्तित्व में था।

दूसरा तर्क – अंतरराष्ट्रीय कानून

अंतरराष्ट्रीय कानून राज्यों के बीच संबंधों को नियंत्रित करता है। विश्व स्तर पर कोई एक संप्रभु नहीं है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन किया जाता है। इसलिए कानून का अस्तित्व संभव है, भले ही कोई एक सर्वोच्च संप्रभु न हो।

तीसरा तर्क – लोकतांत्रिक संविधान

भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में संविधान सर्वोच्च है। संसद और सरकार संविधान से शक्ति प्राप्त करती हैं। यहाँ कोई एक व्यक्ति संप्रभु नहीं है। जनता अंतिम संप्रभु मानी जाती है। फिर भी कानून व्यवस्थित रूप से चलता है।

चौथा तर्क – संघीय व्यवस्था

संघीय प्रणाली में शक्ति केंद्र और राज्यों में विभाजित होती है। कोई एक संस्था पूर्ण संप्रभु नहीं होती। फिर भी कानून प्रभावी रहता है।

पाँचवाँ तर्क – विधि का शासन (Rule of Law)

आधुनिक राज्यों में कानून सर्वोच्च है, न कि शासक। सरकार स्वयं कानून से बंधी होती है। इससे स्पष्ट होता है कि कानून का अस्तित्व संप्रभु पर पूरी तरह निर्भर नहीं है।

अब कंपनी अधिनियम, 2013 के संदर्भ में देखें।

कंपनी अधिनियम संसद द्वारा बनाया गया है। संसद को शक्ति संविधान से प्राप्त होती है। संविधान को जनता ने स्वीकार किया है। इसलिए यहाँ संप्रभुता एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था में निहित है।

धारा 166 निदेशकों के कर्तव्यों को निर्धारित करती है। यह नियम इसलिए वैध है क्योंकि इसे विधायी प्रक्रिया से बनाया गया है। परंतु इसकी वैधता संविधान पर आधारित है।

अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट गवर्नेंस मानक भी कंपनी कानून को प्रभावित करते हैं। ये किसी संप्रभु के आदेश से नहीं, बल्कि व्यापक स्वीकृति से प्रभावी होते हैं।

इससे स्पष्ट है कि आधुनिक युग में कानून का अस्तित्व केवल एक पारंपरिक संप्रभु पर निर्भर नहीं है। कानून के लिए आवश्यक है कि कोई मान्य अधिकार या व्यवस्था हो, जिसे समाज स्वीकार करता हो।

निष्कर्ष:

ऑस्टिन का सिद्धांत ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, परंतु आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र में पूर्णतः लागू नहीं होता। कानून संप्रभु के बिना भी अस्तित्व में रह सकता है, यदि कोई मान्य और स्वीकृत अधिकारिक संरचना मौजूद हो।