परिचय
कंपनी कानून और न्यायशास्त्र में कई सिद्धांत हैं जो यह समझाने का प्रयास करते हैं कि कंपनी की वास्तविक प्रकृति क्या है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या कंपनी केवल कानून द्वारा बनाई गई एक काल्पनिक इकाई है या उसका वास्तविक अस्तित्व भी है।
इस प्रश्न का उत्तर देने वाले सिद्धांतों में से एक है Realist Theory (वास्तविकतावादी सिद्धांत)।
इस सिद्धांत के अनुसार कंपनी केवल कानून की कल्पना नहीं है बल्कि एक वास्तविक सामाजिक संगठन है।
कानून कंपनी को बनाता नहीं है बल्कि उसके अस्तित्व को पहचानता है।
वास्तविकतावादी सिद्धांत का अर्थ
Realist Theory के अनुसार कंपनी एक वास्तविक कानूनी व्यक्ति है।
यह केवल कानून द्वारा बनाई गई काल्पनिक इकाई नहीं है।
कंपनी इसलिए अस्तित्व में आती है क्योंकि कुछ व्यक्ति मिलकर एक संगठन बनाते हैं और एक सामान्य उद्देश्य के लिए कार्य करते हैं।
इस प्रकार कंपनी का अस्तित्व समाज में वास्तविक रूप से होता है।
सिद्धांत का विकास
Realist Theory का विकास जर्मन विधिवेत्ता Otto von Gierke ने किया था।
उनके अनुसार संगठन और संघ वास्तविक सामाजिक इकाइयाँ होते हैं।
उनका अपना सामूहिक उद्देश्य और पहचान होती है।
कॉर्पोरेट पर्सनैलिटी से संबंध
कॉर्पोरेट पर्सनैलिटी का अर्थ है कि कंपनी अपने सदस्यों से अलग कानूनी पहचान रखती है।
Realist Theory के अनुसार यह पहचान वास्तविक होती है।
यदि कंपनी के सदस्य बदल जाएँ तो भी कंपनी का अस्तित्व बना रहता है।
Companies Act, 2013 के अंतर्गत
भारत में Companies Act, 2013 कंपनियों को अलग कानूनी इकाई के रूप में मान्यता देता है।
कंपनी के पंजीकरण के बाद वह एक Body Corporate बन जाती है।
विशेषताएँ
Realist Theory की मुख्य विशेषताएँ हैं:
• कंपनी का वास्तविक अस्तित्व होता है
• यह व्यक्तियों के समूह द्वारा बनती है
• इसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है
• यह सामाजिक और आर्थिक संस्था होती है
महत्व
Realist Theory आधुनिक कंपनियों की वास्तविक स्थिति को समझाती है।
आज बड़ी कंपनियाँ हजारों लोगों को रोजगार देती हैं और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं।
इसलिए उन्हें केवल काल्पनिक इकाई नहीं कहा जा सकता।
निष्कर्ष
Realist Theory के अनुसार कंपनी एक वास्तविक सामाजिक संस्था है जिसका अस्तित्व समाज में स्वतंत्र रूप से होता है।
कानून केवल इस अस्तित्व को मान्यता देता है।