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Compare retributive and reformative theories.

परिचय

दंड आपराधिक न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब कोई व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता है और अपराध करता है, तो राज्य उसे दंड देता है। दंड का उद्देश्य केवल अपराधी को सजा देना नहीं होता बल्कि समाज में न्याय स्थापित करना और भविष्य में अपराध को रोकना भी होता है।

समय-समय पर कई विधि विद्वानों और दार्शनिकों ने यह समझाने का प्रयास किया है कि अपराधी को दंड क्यों दिया जाना चाहिए। इसी कारण दंड के कई सिद्धांत विकसित हुए हैं।

इन सिद्धांतों में प्रतिशोधात्मक सिद्धांत (Retributive Theory) और सुधारात्मक सिद्धांत (Reformative Theory) विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

प्रतिशोधात्मक सिद्धांत के अनुसार अपराधी को इसलिए दंड दिया जाता है क्योंकि उसने अपराध किया है और वह दंड का पात्र है।

इसके विपरीत, सुधारात्मक सिद्धांत यह मानता है कि अपराधी को सुधारना चाहिए ताकि वह भविष्य में समाज का एक अच्छा सदस्य बन सके।

आधुनिक न्याय प्रणाली में इन दोनों सिद्धांतों का संतुलित उपयोग किया जाता है।

कंपनी कानून में भी दंड का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि कंपनी के निदेशक या अधिकारी कानून का उल्लंघन करते हैं, तो उन्हें दंडित किया जाता है।

कंपनी अधिनियम, 2013 में कई अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है जैसे:

धोखाधड़ी

झूठे बयान देना

गलत जानकारी देना

इस प्रकार प्रतिशोधात्मक और सुधारात्मक सिद्धांतों को समझना न्याय व्यवस्था को समझने के लिए आवश्यक है।

प्रतिशोधात्मक सिद्धांत का अर्थ

प्रतिशोधात्मक सिद्धांत दंड का सबसे पुराना सिद्धांत माना जाता है।

इस सिद्धांत के अनुसार अपराधी को इसलिए दंड दिया जाता है क्योंकि उसने अपराध किया है और वह दंड का पात्र है।

इस सिद्धांत का मूल विचार यह है कि:

“जैसा अपराध वैसी सजा”

इस सिद्धांत के अनुसार दंड का उद्देश्य अपराधी को उसके गलत कार्य के लिए कष्ट देना है।

यह सिद्धांत नैतिक न्याय पर आधारित है।

उदाहरण के लिए यदि कोई कंपनी का निदेशक निवेशकों के साथ धोखाधड़ी करता है, तो उसे दंड दिया जाना चाहिए क्योंकि उसने गलत कार्य किया है।

इस सिद्धांत में अपराधी के सुधार की अपेक्षा अपराध के लिए दंड देना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

हालांकि आधुनिक न्याय प्रणाली केवल इस सिद्धांत पर आधारित नहीं है क्योंकि यह सिद्धांत अपराधी के सुधार पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता।

प्रतिशोधात्मक सिद्धांत की विशेषताएँ

प्रतिशोधात्मक सिद्धांत की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

अपराधी को दंड इसलिए दिया जाता है क्योंकि वह उसका पात्र है।

यह सिद्धांत नैतिक न्याय पर आधारित है।

अपराध के बाद दंड आवश्यक माना जाता है।

दंड अपराध के अनुपात में होना चाहिए।

इसका उद्देश्य न्याय की भावना को संतुष्ट करना है।

इस सिद्धांत में मुख्य ध्यान अपराध पर होता है जो पहले ही हो चुका है।

सुधारात्मक सिद्धांत का अर्थ

सुधारात्मक सिद्धांत दंड का आधुनिक सिद्धांत माना जाता है।

इस सिद्धांत के अनुसार दंड का उद्देश्य अपराधी को सुधारना होना चाहिए।

इस सिद्धांत का मानना है कि अपराधी जन्म से अपराधी नहीं होता बल्कि परिस्थितियों के कारण अपराध करता है।

गरीबी, शिक्षा की कमी, सामाजिक समस्याएँ और गलत संगति जैसे कारणों से व्यक्ति अपराध कर सकता है।

इसलिए अपराधी को कठोर दंड देने के बजाय उसे सुधारने का प्रयास करना चाहिए।

सुधारात्मक सिद्धांत के अंतर्गत निम्न उपाय अपनाए जाते हैं:

शिक्षा देना

परामर्श देना

प्रशिक्षण देना

पुनर्वास

इस सिद्धांत का उद्देश्य अपराधी को समाज का जिम्मेदार नागरिक बनाना है।

सुधारात्मक सिद्धांत की विशेषताएँ

सुधारात्मक सिद्धांत की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

इसका उद्देश्य अपराधी को सुधारना है।

यह अपराधी के भविष्य पर ध्यान देता है।

यह मानता है कि अपराधी सुधार सकता है।

इसमें शिक्षा और पुनर्वास महत्वपूर्ण हैं।

यह अपराधियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाता है।

आधुनिक न्याय प्रणाली में इस सिद्धांत को विशेष महत्व दिया जाता है।

प्रतिशोधात्मक और सुधारात्मक सिद्धांतों के बीच अंतर

हालांकि दोनों सिद्धांत दंड से संबंधित हैं, लेकिन इनके उद्देश्य और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं।

प्रतिशोधात्मक सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य अपराधी को उसके अपराध के लिए दंड देना है।

इसके विपरीत सुधारात्मक सिद्धांत का उद्देश्य अपराधी को सुधारना है।

प्रतिशोधात्मक सिद्धांत अतीत में किए गए अपराध पर ध्यान देता है जबकि सुधारात्मक सिद्धांत अपराधी के भविष्य पर ध्यान देता है।

प्रतिशोधात्मक सिद्धांत में कठोर दंड पर जोर दिया जाता है जबकि सुधारात्मक सिद्धांत में मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाता है।

फिर भी आधुनिक न्याय प्रणाली में इन दोनों सिद्धांतों का संतुलित उपयोग किया जाता है।

कंपनी कानून में इन सिद्धांतों का प्रयोग

कंपनी कानून में दंड का उद्देश्य कॉर्पोरेट अपराधों को रोकना और निवेशकों की सुरक्षा करना है।

उदाहरण के लिए:

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 447 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कंपनी से संबंधित धोखाधड़ी करता है, तो उसे कारावास और जुर्माना हो सकता है।

यह दंड प्रतिशोधात्मक सिद्धांत को दर्शाता है क्योंकि अपराधी को उसके गलत कार्य के लिए दंड दिया जाता है।

साथ ही, कॉर्पोरेट गवर्नेंस सुधार, प्रशिक्षण और अनुपालन कार्यक्रम सुधारात्मक सिद्धांत को दर्शाते हैं।

निष्कर्ष

प्रतिशोधात्मक और सुधारात्मक सिद्धांत दंड के दो महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं।

प्रतिशोधात्मक सिद्धांत न्याय और दंड पर आधारित है जबकि सुधारात्मक सिद्धांत अपराधी को सुधारने पर आधारित है।

आधुनिक न्याय प्रणाली इन दोनों सिद्धांतों का संतुलित उपयोग करती है।

कंपनी कानून में भी इन सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है ताकि कॉर्पोरेट अपराधों को रोका जा सके और समाज में न्याय स्थापित किया जा सके।