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Explain modern revival of Natural Law.

प्राकृतिक विधि का आधुनिक पुनर्जागरण (Modern Revival of Natural Law)

प्राकृतिक विधि का सिद्धांत न्यायशास्त्र के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है। इस सिद्धांत के अनुसार कानून केवल राज्य द्वारा बनाए गए नियमों का समूह नहीं है, बल्कि उसे नैतिकता, न्याय और मानवीय मूल्यों के आधार पर होना चाहिए। प्राकृतिक विधि के विचारकों का मानना है कि कुछ ऐसे सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत होते हैं जो मानव समाज में हमेशा लागू होते हैं। इन सिद्धांतों को प्राकृतिक नियम कहा जाता है और कानून को इन्हीं सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।

प्राचीन काल में प्राकृतिक विधि का सिद्धांत बहुत प्रभावशाली था। यूनानी और रोमन दार्शनिकों जैसे अरस्तू, सिसरो और बाद में थॉमस एक्विनास ने यह विचार प्रस्तुत किया कि कानून का उद्देश्य न्याय और नैतिकता की स्थापना करना है। उनके अनुसार यदि कोई कानून अन्यायपूर्ण है तो उसे वास्तविक कानून नहीं माना जा सकता।

लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी में प्राकृतिक विधि का महत्व कम होने लगा। इसका मुख्य कारण विधिक प्रत्यक्षवाद (Legal Positivism) का विकास था। प्रत्यक्षवाद के समर्थकों का कहना था कि कानून वही है जो राज्य या संप्रभु सत्ता द्वारा बनाया गया हो। उनके अनुसार कानून की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे विधि बनाने वाली उचित प्राधिकरण ने बनाया है या नहीं, न कि इस पर कि वह नैतिक रूप से सही है या गलत।

इस सिद्धांत के कारण कानून और नैतिकता के बीच स्पष्ट अंतर कर दिया गया। परिणामस्वरूप कई बार ऐसे कानून भी मान्य माने गए जो नैतिक रूप से गलत थे। यह समस्या बीसवीं शताब्दी में विशेष रूप से स्पष्ट हुई।

द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी में नाजी सरकार ने कई ऐसे कानून बनाए जो कुछ समुदायों के खिलाफ भेदभाव करते थे। इन कानूनों के कारण यहूदियों और अन्य समूहों के साथ अत्याचार किया गया। ये कानून उस समय के कानूनी ढांचे के अनुसार वैध थे क्योंकि उन्हें सरकार ने बनाया था। लेकिन नैतिक दृष्टि से ये अत्यंत अन्यायपूर्ण और अमानवीय थे।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह प्रश्न उठने लगा कि क्या केवल इसलिए किसी कानून को वैध माना जा सकता है क्योंकि उसे सरकार ने बनाया है। कई विद्वानों और न्यायाधीशों ने यह तर्क दिया कि जो कानून मानवता और न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं, उन्हें वास्तविक कानून नहीं माना जा सकता।

इसी सोच के कारण प्राकृतिक विधि के सिद्धांत को फिर से महत्व मिलने लगा। इसे ही प्राकृतिक विधि का आधुनिक पुनर्जागरण (Modern Revival of Natural Law) कहा जाता है।

आधुनिक पुनर्जागरण का अर्थ है कि बीसवीं शताब्दी में प्राकृतिक विधि के सिद्धांतों को फिर से स्वीकार किया गया और यह माना गया कि कानून को न्याय, समानता और मानव गरिमा की रक्षा करनी चाहिए।

इस पुनर्जागरण का एक प्रमुख कारण मानव अधिकारों का विकास था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने यह महसूस किया कि मानव अधिकारों की रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है। इसी कारण 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights) को अपनाया गया।

इस घोषणा में यह स्वीकार किया गया कि सभी मनुष्यों को जन्म से ही कुछ मूलभूत अधिकार प्राप्त होते हैं जैसे जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, समानता का अधिकार और सम्मान के साथ जीने का अधिकार। ये अधिकार सरकार द्वारा दिए गए नहीं होते बल्कि मानव होने के कारण स्वाभाविक रूप से प्राप्त होते हैं।

यह विचार प्राकृतिक विधि के सिद्धांत से मेल खाता है क्योंकि यह मानता है कि कुछ अधिकार मानव प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और उन्हें राज्य द्वारा छीना नहीं जा सकता।

आधुनिक प्राकृतिक विधि का प्रभाव संवैधानिक कानून पर भी पड़ा। दुनिया के कई देशों के संविधान में मौलिक अधिकारों को शामिल किया गया। इन अधिकारों का उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना है।

भारत का संविधान भी प्राकृतिक विधि के कई सिद्धांतों को दर्शाता है। संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों का प्रावधान किया गया है जो नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा प्रदान करते हैं।

उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस अनुच्छेद की व्यापक व्याख्या की है। न्यायालय ने कहा है कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है।

इसमें आजीविका का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार भी शामिल किया गया है। यह व्याख्या प्राकृतिक विधि के सिद्धांतों को दर्शाती है क्योंकि यह मानव गरिमा को प्राथमिकता देती है।

आधुनिक प्राकृतिक विधि का पुनर्जागरण सामाजिक न्याय की अवधारणा से भी जुड़ा हुआ है। आधुनिक कानूनी प्रणाली का उद्देश्य केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं है बल्कि समाज में समानता और न्याय स्थापित करना भी है।

कानूनों के माध्यम से कमजोर वर्गों की रक्षा की जाती है और सामाजिक असमानताओं को कम करने का प्रयास किया जाता है।

आधुनिक प्राकृतिक विधि के विकास में कई विद्वानों का योगदान रहा है।

लोन फुलर (Lon Fuller) ने यह सिद्धांत दिया कि कानून की भी एक आंतरिक नैतिकता होती है। उनके अनुसार यदि कानून स्पष्ट, न्यायसंगत और समान रूप से लागू नहीं होता तो वह प्रभावी नहीं हो सकता।

जॉन फिनिस (John Finnis) ने प्राकृतिक विधि को आधुनिक रूप दिया। उन्होंने कहा कि कानून को कुछ मूलभूत मानवीय मूल्यों जैसे जीवन, ज्ञान, मित्रता और न्याय को बढ़ावा देना चाहिए।

रोनाल्ड ड्वर्किन (Ronald Dworkin) ने भी यह कहा कि न्यायाधीशों को कानून की व्याख्या करते समय नैतिक सिद्धांतों को ध्यान में रखना चाहिए।

आधुनिक प्राकृतिक विधि का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय कानून में भी दिखाई देता है। आज अंतरराष्ट्रीय कानून में मानव अधिकारों की सुरक्षा, युद्ध अपराधों की रोकथाम और मानवता के खिलाफ अपराधों को दंडित करने पर जोर दिया जाता है।

उदाहरण के लिए, नरसंहार (Genocide) और युद्ध अपराधों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपराध माना जाता है, भले ही किसी देश का घरेलू कानून उन्हें अनुमति देता हो।

प्राकृतिक विधि का प्रभाव कॉर्पोरेट कानून में भी देखा जा सकता है। आधुनिक कॉर्पोरेट कानून केवल व्यापारिक लाभ पर ही ध्यान नहीं देता बल्कि नैतिक आचरण और सामाजिक जिम्मेदारी पर भी जोर देता है।

कंपनी अधिनियम, 2013 के अनुसार निदेशकों को सद्भावना के साथ कंपनी और उसके हितधारकों के हित में कार्य करना चाहिए।

यह प्रावधान यह दर्शाता है कि व्यापारिक गतिविधियों में भी नैतिकता और जिम्मेदारी का महत्व है।

इस प्रकार आधुनिक प्राकृतिक विधि का उद्देश्य कानून और नैतिकता के बीच संतुलन स्थापित करना है। कानून समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है, लेकिन उसे न्याय और मानव गरिमा की रक्षा भी करनी चाहिए।

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि प्राकृतिक विधि का आधुनिक पुनर्जागरण इस विचार को पुनः स्थापित करता है कि कानून को केवल राज्य की शक्ति का साधन नहीं होना चाहिए बल्कि उसे न्याय, नैतिकता और मानव गरिमा की रक्षा करनी चाहिए।