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How did Natural Law influence human rights?

प्राकृतिक विधि (Natural Law) न्यायशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार कानून केवल राज्य द्वारा बनाए गए नियमों का समूह नहीं है, बल्कि उसे नैतिकता, न्याय और मानवीय मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। प्राकृतिक विधि का मूल विचार यह है कि कुछ ऐसे सार्वभौमिक सिद्धांत होते हैं जो मानव प्रकृति और बुद्धि से उत्पन्न होते हैं और जो यह निर्धारित करते हैं कि समाज में क्या सही है और क्या गलत है।

प्राकृतिक विधि के विचारकों का मानना है कि प्रत्येक मनुष्य को कुछ अधिकार जन्म से ही प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों को प्राकृतिक अधिकार (Natural Rights) कहा जाता है। ये अधिकार किसी सरकार द्वारा दिए गए नहीं होते बल्कि मानव होने के कारण स्वाभाविक रूप से प्राप्त होते हैं।

इन्हीं प्राकृतिक अधिकारों की अवधारणा से आधुनिक मानवाधिकार (Human Rights) की अवधारणा विकसित हुई।

मानवाधिकार वे मूल अधिकार और स्वतंत्रताएँ हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को केवल मानव होने के कारण प्राप्त होते हैं। ये अधिकार व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करते हैं।

प्राकृतिक विधि का प्रभाव मानवाधिकारों के विकास में बहुत महत्वपूर्ण रहा है।

प्राकृतिक विधि के विचार सबसे पहले प्राचीन यूनानी और रोमन दार्शनिकों के लेखन में दिखाई देते हैं।

यूनानी दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) का मानना था कि न्याय और समानता प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।

रोमन दार्शनिक सिसरो (Cicero) ने कहा कि प्रकृति पर आधारित एक सार्वभौमिक कानून होता है जो सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू होता है।

मध्यकाल में थॉमस एक्विनास (Thomas Aquinas) ने प्राकृतिक विधि के सिद्धांत को और स्पष्ट किया। उनके अनुसार मानव द्वारा बनाए गए कानूनों को प्राकृतिक विधि के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।

यदि कोई कानून अन्यायपूर्ण है तो उसे वास्तविक कानून नहीं माना जा सकता।

इन विचारों ने आधुनिक मानवाधिकारों की अवधारणा की नींव रखी।

सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक विधि के सिद्धांत ने प्राकृतिक अधिकारों के विचार को और विकसित किया।

इस काल के प्रसिद्ध दार्शनिक जॉन लॉक (John Locke) ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार प्राकृतिक रूप से प्राप्त होते हैं।

लॉक के अनुसार सरकार का मुख्य उद्देश्य इन प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा करना है।

यदि सरकार इन अधिकारों की रक्षा करने में असफल रहती है तो जनता को सरकार का विरोध करने का अधिकार होता है।

जॉन लॉक के विचारों ने आधुनिक लोकतंत्र और मानवाधिकारों के विकास को बहुत प्रभावित किया।

इन विचारों का प्रभाव कई ऐतिहासिक दस्तावेजों में दिखाई देता है।

उदाहरण के लिए:

अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणा (1776) में यह कहा गया कि सभी मनुष्य समान पैदा होते हैं और उन्हें कुछ अविच्छिन्न अधिकार प्राप्त होते हैं जैसे जीवन, स्वतंत्रता और सुख की खोज।

इसी प्रकार फ्रांसीसी मानव और नागरिक अधिकार घोषणा (1789) में स्वतंत्रता, समानता और सुरक्षा के अधिकारों को मान्यता दी गई।

इन दोनों घोषणाओं पर प्राकृतिक विधि के सिद्धांत का गहरा प्रभाव था।

प्राकृतिक विधि का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के विकास में भी देखा जा सकता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विश्व ने मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन देखे।

नरसंहार, नस्लीय भेदभाव और हिंसा जैसी घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह महसूस कराया कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए वैश्विक स्तर पर नियम बनाए जाने चाहिए।

इसी कारण 1948 में संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights – UDHR) को अपनाया।

इस घोषणा में कई मूल अधिकारों को मान्यता दी गई जैसे:

जीवन का अधिकार
स्वतंत्रता का अधिकार
समानता का अधिकार
गरिमा का अधिकार
शिक्षा का अधिकार
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

ये अधिकार सार्वभौमिक माने जाते हैं और सभी मनुष्यों को प्राप्त होते हैं।

यह विचार प्राकृतिक विधि के सिद्धांत से मेल खाता है क्योंकि प्राकृतिक विधि भी यह मानती है कि कुछ अधिकार मानव प्रकृति से उत्पन्न होते हैं।

प्राकृतिक विधि का प्रभाव आधुनिक संविधानों में भी दिखाई देता है।

भारत के संविधान में भी मौलिक अधिकारों के माध्यम से मानवाधिकारों की रक्षा की गई है।

संविधान के भाग III में नागरिकों को कई महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं।

उदाहरण के लिए:

अनुच्छेद 14 – कानून के समक्ष समानता
अनुच्छेद 19 – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

ये अधिकार मानव गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।

भारत का सर्वोच्च न्यायालय इन अधिकारों की व्यापक व्याख्या करता है।

न्यायालय ने कहा है कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं है बल्कि सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी है।

इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और निजता के अधिकार भी शामिल हैं।

यह व्याख्या प्राकृतिक विधि के सिद्धांत को दर्शाती है।

प्राकृतिक विधि मानवाधिकारों के एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत समानता और भेदभाव रहित समाज को भी समर्थन देती है।

मानवाधिकार कानून यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, लिंग या राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव न किया जाए।

यह विचार प्राकृतिक विधि के सिद्धांत से प्रेरित है क्योंकि प्राकृतिक विधि सभी मनुष्यों को समान मानती है।

प्राकृतिक विधि सीमित सरकार की अवधारणा को भी समर्थन देती है।

इस सिद्धांत के अनुसार सरकार की शक्ति सीमित होनी चाहिए ताकि नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहें।

मानवाधिकार कानून यह सुनिश्चित करते हैं कि सरकार नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन न करे।

प्राकृतिक विधि का प्रभाव कॉर्पोरेट शासन में भी देखा जा सकता है।

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 166 के अनुसार निदेशकों को सद्भावना और जिम्मेदारी के साथ कार्य करना चाहिए।

यह सिद्धांत यह दर्शाता है कि शक्ति का उपयोग नैतिक रूप से किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि प्राकृतिक विधि ने मानवाधिकारों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्राकृतिक विधि ने यह विचार प्रस्तुत किया कि प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से कुछ अधिकार प्राप्त होते हैं। इन विचारों ने आधुनिक मानवाधिकार कानून, संवैधानिक अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्था को प्रभावित किया है।