नारीवादी विधिशास्त्र (Feminist Jurisprudence) विधिक सिद्धांत की एक शाखा है जो यह अध्ययन करती है कि कानून महिलाओं को कैसे प्रभावित करता है और इतिहास में कानून ने महिलाओं के साथ किस प्रकार असमान व्यवहार किया है।
यह कानून और लिंग (Gender) के बीच संबंध का अध्ययन करता है और कानूनी प्रणाली में मौजूद लैंगिक पक्षपात को पहचानने और समाप्त करने का प्रयास करता है।
नारीवादी आंदोलन प्रारंभ में एक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन था जिसका उद्देश्य महिलाओं को समान अधिकार दिलाना था।
समय के साथ नारीवादी विद्वानों ने यह अध्ययन करना शुरू किया कि कानून किस प्रकार लैंगिक असमानता को बनाए रखता है।
इससे नारीवादी विधिशास्त्र का विकास हुआ।
नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि इतिहास में अधिकांश कानून पुरुष-प्रधान समाजों में बनाए गए थे।
इस कारण कानून अक्सर पुरुषों के दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है और महिलाओं के अनुभवों को नजरअंदाज करता है।
उदाहरण के लिए पहले कई देशों में महिलाओं को संपत्ति रखने, मतदान करने और रोजगार पाने के अधिकार सीमित थे।
नारीवादी विधिशास्त्र इन धारणाओं को चुनौती देता है और समानता को बढ़ावा देता है।
इस सिद्धांत के कुछ महत्वपूर्ण विषय हैं:
पहला विषय है लैंगिक समानता।
दूसरा विषय है महिलाओं के अनुभवों की मान्यता।
तीसरा विषय है पुरुष-प्रधान कानूनी संस्थाओं की आलोचना।
नारीवादी विद्वानों ने यह भी बताया कि पारंपरिक कानून घरेलू हिंसा जैसे मामलों को निजी मामला मानता था।
नारीवादी सिद्धांत ने यह तर्क दिया कि घरेलू हिंसा भी एक गंभीर कानूनी अपराध है।
भारत में नारीवादी विधिशास्त्र ने कई महत्वपूर्ण कानूनों को प्रभावित किया है, जैसे:
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005
कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम) अधिनियम, 2013
नारीवादी विधिशास्त्र का उद्देश्य महिलाओं के लिए न्याय और समानता सुनिश्चित करना है।