नारीवादी सिद्धांत पारंपरिक कानून को इस धारणा को चुनौती देकर बदलने का प्रयास करता है कि कानून पूरी तरह लैंगिक रूप से निष्पक्ष है।
पारंपरिक कानूनी प्रणाली अक्सर महिलाओं के अनुभवों को नजरअंदाज करती रही है।
नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि कई कानूनी नियम पुरुष-प्रधान समाजों में विकसित हुए।
इस कारण वे कभी-कभी लैंगिक असमानता को बनाए रखते हैं।
नारीवादी सिद्धांत कई तरीकों से पारंपरिक कानून को चुनौती देता है:
पहला, यह कानूनों और संस्थाओं में मौजूद लैंगिक पक्षपात को उजागर करता है।
दूसरा, यह पुरुष और महिला के बीच समानता सुनिश्चित करने के लिए कानूनी सुधारों की मांग करता है।
तीसरा, यह घरेलू हिंसा, कार्यस्थल उत्पीड़न और प्रजनन अधिकार जैसे मुद्दों को कानूनी मान्यता दिलाने का प्रयास करता है।