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Explain basic structure doctrine in light of Kesavananda Bharati.

मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) भारतीय संवैधानिक कानून का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह संसद की संविधान संशोधन शक्ति को सीमित करता है।

इस सिद्धांत के अनुसार संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान में संशोधन करने का अधिकार है, लेकिन वह संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) को नष्ट या बदल नहीं सकती।

यह सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) मामले में स्थापित किया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद तब शुरू हुआ जब केरल सरकार ने भूमि सुधार कानून बनाए जिनका उद्देश्य भूमि का पुनर्वितरण करना था।

इन कानूनों को स्वामी केशवानंद भारती, जो एक धार्मिक संस्था के प्रमुख थे, ने चुनौती दी।

उन्होंने तर्क दिया कि भूमि सुधार कानून उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

इस समय संसद ने कई संवैधानिक संशोधन भी किए थे जिनका उद्देश्य न्यायिक समीक्षा की शक्ति को सीमित करना था।

मुख्य प्रश्न यह था कि क्या संसद के पास संविधान संशोधन की असीमित शक्ति है।

न्यायालय का निर्णय

इस मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने की।

24 अप्रैल 1973 को न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय दिया।

न्यायालय ने कहा कि संसद के पास संविधान संशोधन की व्यापक शक्ति है, लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है।

संसद संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।

मूल संरचना का अर्थ

न्यायालय ने मूल संरचना की पूरी सूची नहीं दी, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण तत्वों को इसमें शामिल बताया।

जैसे:

संविधान की सर्वोच्चता

विधि का शासन

शक्तियों का पृथक्करण

न्यायिक समीक्षा

संघीय व्यवस्था

धर्मनिरपेक्षता

लोकतांत्रिक शासन

मौलिक अधिकारों की सुरक्षा

सिद्धांत का महत्व

यह सिद्धांत संविधान की स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करता है।

यह संसद को संविधान की मूल विशेषताओं को नष्ट करने से रोकता है।

उदाहरण के लिए संसद लोकतंत्र को समाप्त करने या न्यायिक समीक्षा को खत्म करने वाला संशोधन नहीं कर सकती।

आलोचना

कुछ आलोचक कहते हैं कि यह सिद्धांत न्यायपालिका को बहुत अधिक शक्ति देता है।

क्योंकि संविधान में “मूल संरचना” शब्द स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया है।

फिर भी समर्थकों का मानना है कि यह सिद्धांत लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवश्यक है।

भारतीय कानून पर प्रभाव

केशवानंद भारती मामले के बाद कई मामलों में इस सिद्धांत को लागू किया गया।

जैसे:

इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975)

मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)

आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007)

इस प्रकार मूल संरचना सिद्धांत भारतीय संविधान की रक्षा का एक महत्वपूर्ण साधन है।