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A Parliament passes a law restricting free speech. Analyze from Natural Law and Positivist perspectives.

विधिशास्त्र में विभिन्न सिद्धांत कानून की व्याख्या अलग-अलग तरीके से करते हैं। दो महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं प्राकृतिक विधि सिद्धांत (Natural Law Theory) और कानूनी प्रत्यक्षवाद (Legal Positivism)।

मान लीजिए कि संसद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने वाला कानून बनाती है। इस स्थिति का विश्लेषण इन दोनों सिद्धांतों के आधार पर किया जा सकता है।

प्राकृतिक विधि दृष्टिकोण

प्राकृतिक विधि सिद्धांत का आधार यह विचार है कि कानून को नैतिक सिद्धांतों और मानव अधिकारों के अनुरूप होना चाहिए।

थॉमस एक्विनास और जॉन लॉक जैसे विचारकों के अनुसार अन्यायपूर्ण कानून वास्तव में कानून नहीं होता।

भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत संरक्षित है।

यदि संसद ऐसा कानून बनाती है जो इस स्वतंत्रता को अनुचित रूप से सीमित करता है, तो प्राकृतिक विधि सिद्धांत के अनुसार यह कानून अन्यायपूर्ण माना जा सकता है।

प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण

कानूनी प्रत्यक्षवाद के अनुसार कानून की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि वह सक्षम प्राधिकारी द्वारा उचित प्रक्रिया के अनुसार बनाया गया है या नहीं।

यदि संसद संविधान के अनुसार कानून बनाती है, तो वह कानूनी रूप से वैध माना जाएगा।

हालाँकि यदि वह कानून संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकते हैं।