हांस केल्सन 20वीं सदी के एक महान विधि दार्शनिक थे। उनका सिद्धांत “शुद्ध विधि सिद्धांत” के नाम से जाना जाता है। “शुद्ध” शब्द का अर्थ है – बाहरी प्रभाव से मुक्त। केल्सन चाहते थे कि कानून का अध्ययन केवल कानून के रूप में किया जाए, उसे नैतिकता, धर्म, राजनीति या समाजशास्त्र से न जोड़ा जाए।
केल्सन का मानना था कि पहले के कई सिद्धांत कानून को नैतिकता से जोड़ देते थे। प्राकृतिक विधि सिद्धांत कहता है कि कानून नैतिक होना चाहिए। लेकिन केल्सन इससे सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा कि कानून अच्छा है या बुरा, यह कानूनी विज्ञान का विषय नहीं है। कानून को केवल नियमों की व्यवस्था के रूप में समझना चाहिए।
केल्सन के अनुसार कानून “नॉर्म्स” की व्यवस्था है। नॉर्म का अर्थ है – ऐसा नियम जो बताता है कि क्या किया जाना चाहिए। कानून तथ्य नहीं बताता, बल्कि आचरण निर्धारित करता है। जैसे कंपनियों अधिनियम, 2013 की धारा 447 में धोखाधड़ी के लिए सजा का प्रावधान है। यह कोई तथ्य नहीं बताता, बल्कि यह कहता है कि धोखाधड़ी नहीं करनी चाहिए, और यदि की जाए तो दंड मिलेगा।
केल्सन ने “is” और “ought” में अंतर किया। “is” का अर्थ है – तथ्य। “ought” का अर्थ है – कर्तव्य। कानून “ought” की दुनिया से संबंधित है। जैसे यदि कोई कंपनी धारा 92 के तहत वार्षिक रिटर्न दाखिल नहीं करती, तो दंड लगाया जाएगा। यह कानूनी नॉर्म है।
केल्सन ने नियमों की पदानुक्रम (Hierarchy) की बात की। उनके अनुसार कानून एक पिरामिड की तरह है। सबसे ऊपर “Grundnorm” होता है। Grundnorm का अर्थ है – मूल नियम।
Grundnorm कहीं लिखा नहीं होता, यह माना जाता है। भारत में संविधान सर्वोच्च है। लेकिन संविधान वैध क्यों है? क्योंकि हम मानते हैं कि संविधान का पालन किया जाना चाहिए। यही Grundnorm है।
संविधान से संसद को कानून बनाने की शक्ति मिलती है। संसद से कंपनियों अधिनियम बनता है। अधिनियम से नियम बनते हैं। नियमों से कंपनी के निर्णय बनते हैं। यदि कोई निचला नियम ऊपरी नियम के खिलाफ है, तो वह अमान्य होगा।
उदाहरण के लिए यदि कंपनी का कोई प्रस्ताव धारा 179 के खिलाफ है, तो वह अमान्य होगा क्योंकि वह अधिनियम के खिलाफ है।
केल्सन के अनुसार कानून की वैधता उसकी प्रक्रिया पर निर्भर करती है, नैतिकता पर नहीं। यदि संसद ने विधि सम्मत प्रक्रिया से कानून बनाया है, तो वह वैध है।
कंपनी कानून में भी यही व्यवस्था दिखती है। संविधान → कंपनियों अधिनियम → नियम → अनुच्छेद (Articles) → बोर्ड का प्रस्ताव। यह पूरी संरचना केल्सन के सिद्धांत को दर्शाती है।
केल्सन ने कहा कि कानून में दंड होना आवश्यक है। यदि नियम का उल्लंघन हो, तो दंड मिलना चाहिए। यही कानून को प्रभावी बनाता है।
आलोचना:
कुछ विद्वानों ने कहा कि कानून को नैतिकता से अलग नहीं किया जा सकता। कंपनियों अधिनियम की धारा 135 (CSR) से स्पष्ट है कि नैतिकता भी कानून का हिस्सा है।
फिर भी, केल्सन का सिद्धांत विधि को वैज्ञानिक रूप से समझने में बहुत महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष:
केल्सन का शुद्ध विधि सिद्धांत कानून को व्यवस्थित रूप से समझने का एक मजबूत आधार देता है। यह बताता है कि कानून की वैधता उसकी संरचना और प्रक्रिया से आती है, न कि नैतिकता से।