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A custom is followed in a village but violates constitutional morality. Can it be recognized as law?

“एक गाँव में प्रचलित कोई प्रथा यदि संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन करती है, तो क्या उसे विधि के रूप में मान्यता दी जा सकती है?”

यह प्रश्न प्रथा और संवैधानिक नैतिकता के संबंध से जुड़ा हुआ है। यह समझना आवश्यक है कि क्या कोई ऐसी प्रथा, जो किसी गाँव या समुदाय में लंबे समय से प्रचलित है, केवल इसलिए विधि बन सकती है क्योंकि वह पुरानी है, भले ही वह संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करती हो।

इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें तीन मुख्य अवधारणाएँ समझनी होंगी:

प्रथा का अर्थ

संवैधानिक नैतिकता का अर्थ

आधुनिक विधि प्रणाली में प्रथा की स्थिति

प्रथा का अर्थ

प्रथा विधि का सबसे प्राचीन स्रोत है। जब लिखित कानून नहीं थे, तब समाज अपने व्यवहार को परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार चलाता था। जब कोई व्यवहार लंबे समय तक निरंतर और समान रूप से अपनाया जाता है और समाज उसे बाध्यकारी मानता है, तब वह प्रथा कहलाता है।

किसी प्रथा को विधि के रूप में मान्यता पाने के लिए निम्न शर्तें पूरी करनी होती हैं:

वह प्राचीन हो

वह निरंतर चली आ रही हो

वह निश्चित और स्पष्ट हो

वह उचित और न्यायसंगत हो

वह सार्वजनिक नीति के विरुद्ध न हो

वह किसी विधि के विरुद्ध न हो

यदि कोई प्रथा इन शर्तों को पूरा नहीं करती, तो उसे विधिक मान्यता नहीं मिल सकती।

संवैधानिक नैतिकता का अर्थ

संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है संविधान में निहित मूल्यों और सिद्धांतों का पालन। इसमें शामिल हैं:

विधि के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14)

भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15)

अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19)

जीवन और गरिमा का अधिकार (अनुच्छेद 21)

संवैधानिक नैतिकता सामाजिक नैतिकता से भिन्न होती है। सामाजिक नैतिकता स्थान-स्थान पर बदल सकती है। परंतु संवैधानिक नैतिकता पूरे देश में समान रूप से लागू होती है।

प्रथा और संवैधानिक नैतिकता में टकराव

कभी-कभी किसी गाँव या समुदाय में ऐसी प्रथा हो सकती है जो महिलाओं, निम्न जाति या किसी विशेष वर्ग के लोगों के अधिकारों को सीमित करती हो। वह प्रथा वर्षों से प्रचलित हो सकती है। परंतु यदि वह समानता और गरिमा के सिद्धांत का उल्लंघन करती है, तो वह संवैधानिक नैतिकता के विरुद्ध होगी।

भारत में संविधान सर्वोच्च है। संविधान के बाद ही अन्य सभी स्रोत आते हैं, जिनमें प्रथा भी शामिल है।

अनुच्छेद 13 स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि कोई कानून मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है, तो वह शून्य होगा। “कानून” शब्द में प्रथा और परंपरा भी शामिल हैं।

इसका अर्थ यह है कि यदि कोई प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो वह स्वतः अमान्य हो जाएगी।

न्यायालय का दृष्टिकोण

भारत का सर्वोच्च न्यायालय बार-बार यह कह चुका है कि संवैधानिक नैतिकता सामाजिक नैतिकता से ऊपर है।

Navtej Singh Johar मामले में न्यायालय ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

Shayara Bano मामले में धार्मिक प्रथा को इसलिए निरस्त किया गया क्योंकि वह संविधान के सिद्धांतों के विरुद्ध थी।

ये निर्णय स्पष्ट करते हैं कि कोई भी प्रथा, चाहे वह कितनी भी पुरानी क्यों न हो, यदि वह संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है, तो उसे विधि के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती।

कंपनी कानून से संबंध

यद्यपि यह प्रश्न मुख्यतः संवैधानिक कानून से जुड़ा है, परंतु कंपनी कानून में भी इसका महत्व है।

कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत:

निदेशक को कानून के अनुसार कार्य करना होता है (धारा 166)

कंपनी को वैधानिक प्रावधानों का पालन करना होता है

स्थानीय प्रथा के आधार पर भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं किया जा सकता

यदि कोई कंपनी गाँव में स्थित है और वह किसी स्थानीय प्रथा के आधार पर महिलाओं को नौकरी नहीं देती, तो वह यह कहकर बच नहीं सकती कि “यह गाँव की परंपरा है।” संविधान और कंपनी अधिनियम लागू होंगे।

निष्कर्ष

एक ऐसी प्रथा जो संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन करती है, उसे विधि के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती। संविधान सर्वोच्च है। अनुच्छेद 13 ऐसी प्रथाओं को शून्य घोषित करता है। इसलिए चाहे वह प्रथा कितनी भी पुरानी क्यों न हो, यदि वह समानता और गरिमा के सिद्धांत के विरुद्ध है, तो उसे कानून के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।