न्यायशास्त्र (Jurisprudence) में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या न्यायाधीश को निर्णय कानून के आधार पर देना चाहिए या अपनी व्यक्तिगत नैतिकता के आधार पर। “एक न्यायाधीश अपने व्यक्तिगत नैतिक विचारों के आधार पर निर्णय देता है” – यह कथन विधि व्यवस्था की मूल नींव को चुनौती देता है। कानून और नैतिकता का आपस में संबंध अवश्य है, परंतु दोनों एक समान नहीं हैं। यदि न्यायाधीश अपने निजी नैतिक विचारों को कानून से ऊपर रख दे, तो विधि की निश्चितता और स्थिरता समाप्त हो सकती है।
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि कानून और नैतिकता क्या हैं। कानून राज्य द्वारा बनाए गए नियमों का समूह है। ये नियम लिखित होते हैं, लागू किए जा सकते हैं, और इनके पीछे राज्य की शक्ति होती है। दूसरी ओर नैतिकता व्यक्ति के अंदर की सही-गलत की भावना है। यह व्यक्ति-व्यक्ति में अलग हो सकती है। कानून सार्वजनिक और वस्तुनिष्ठ (objective) होता है, जबकि नैतिकता निजी और व्यक्तिनिष्ठ (subjective) होती है।
न्यायशास्त्र में विभिन्न सिद्धांत कानून और नैतिकता के संबंध पर चर्चा करते हैं। प्राकृतिक विधि सिद्धांत (Natural Law Theory) कहता है कि कानून का आधार नैतिकता होना चाहिए। यदि कोई कानून अनैतिक है तो वह वास्तविक कानून नहीं है। सेंट थॉमस एक्विनास जैसे विचारकों का मानना था कि कानून और नैतिकता अलग नहीं हो सकते।
इसके विपरीत विधिक प्रत्यक्षवाद (Legal Positivism) कहता है कि कानून और नैतिकता अलग-अलग हैं। जॉन ऑस्टिन और एच.एल.ए. हार्ट जैसे विचारकों ने कहा कि कानून तभी वैध है जब वह उचित प्राधिकारी द्वारा बनाया गया हो, चाहे वह नैतिक रूप से सही हो या नहीं।
यदि न्यायाधीश केवल व्यक्तिगत नैतिकता के आधार पर निर्णय देने लगे, तो न्यायिक व्यवस्था में अस्थिरता आ जाएगी। एक न्यायाधीश किसी कार्य को नैतिक मान सकता है, जबकि दूसरा उसे अनैतिक मान सकता है। इससे समान मामलों में अलग-अलग निर्णय आने लगेंगे। यह विधि की निश्चितता (certainty) और पूर्वानुमानिता (predictability) को नष्ट कर देगा।
कंपनी विधि के संदर्भ में, कंपनी अधिनियम, 2013 में निदेशकों के कर्तव्य, दायित्व और दंड स्पष्ट रूप से दिए गए हैं। उदाहरण के लिए धारा 166 निदेशकों के कर्तव्यों को स्पष्ट रूप से बताती है। न्यायाधीश इन स्पष्ट प्रावधानों को नजरअंदाज करके अपने निजी विचारों के आधार पर निर्णय नहीं दे सकता।
यदि कोई निदेशक कंपनी के हित के विरुद्ध कार्य करता है, तो न्यायालय को धारा 166 और अन्य संबंधित धाराओं के आधार पर निर्णय देना होगा, न कि यह सोचकर कि उसका इरादा नैतिक था।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। यदि न्यायाधीश व्यक्तिगत नैतिकता के आधार पर निर्णय देगा, तो समानता का सिद्धांत प्रभावित होगा, क्योंकि निर्णय व्यक्ति विशेष की सोच पर निर्भर हो जाएगा।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि नैतिकता का कोई स्थान नहीं है। कई बार कानून अस्पष्ट या मौन (silent) होता है। ऐसे में न्यायाधीश व्याख्या (interpretation) करता है। व्याख्या करते समय वह संवैधानिक मूल्यों जैसे न्याय, समानता और स्वतंत्रता को ध्यान में रख सकता है। इसे संवैधानिक नैतिकता (constitutional morality) कहते हैं।
संवैधानिक नैतिकता और व्यक्तिगत नैतिकता में अंतर है। व्यक्तिगत नैतिकता निजी विश्वास है, जबकि संवैधानिक नैतिकता संविधान में लिखे मूल्यों पर आधारित है।
उदाहरण के लिए कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 447 धोखाधड़ी (fraud) के लिए दंड निर्धारित करती है। यदि कोई व्यक्ति धोखाधड़ी करता है, तो न्यायाधीश को कानूनी प्रावधान लागू करना होगा। वह केवल इस आधार पर दंड नहीं दे सकता कि उसे वह कार्य अनैतिक लगता है। दंड का आधार विधि होना चाहिए।
यदि न्यायाधीश व्यक्तिगत नैतिकता को कानून से ऊपर रख देगा, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा। कानून संसद बनाती है। न्यायालय का कार्य कानून की व्याख्या और अनुप्रयोग करना है। यदि न्यायालय अपनी निजी नैतिकता को लागू करने लगे, तो यह न्यायिक अतिक्रमण (judicial overreach) कहलाएगा।
कंपनी विवादों में, विशेषकर धारा 241–242 (उत्पीड़न और कुप्रबंधन) के अंतर्गत, न्यायालय यह देखता है कि क्या कंपनी के मामलों का संचालन सदस्यों के हित के विरुद्ध है। यहाँ भी निर्णय कानूनी मानकों के आधार पर होता है, न कि व्यक्तिगत नैतिक विचारों पर।
अतः न्यायशास्त्रीय दृष्टि से यह स्पष्ट है कि न्यायाधीश को कानून के आधार पर निर्णय देना चाहिए। नैतिकता केवल मार्गदर्शन कर सकती है, परंतु कानून का स्थान नहीं ले सकती। न्याय का आधार “विधि का शासन” (Rule of Law) है, न कि “व्यक्ति की अंतरात्मा का शासन”।
निष्कर्षतः, न्यायशास्त्र यह सिखाता है कि न्यायाधीश को लिखित कानून का पालन करना चाहिए। व्यक्तिगत नैतिकता कभी भी विधि से ऊपर नहीं हो सकती। न्याय की स्थिरता और समानता के लिए विधि सर्वोपरि है।