जॉन रॉल्स और अमर्त्य सेन के सिद्धांत आधुनिक न्याय सिद्धांतों के दो महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। दोनों विचारकों ने यह समझाने का प्रयास किया कि एक न्यायपूर्ण समाज कैसे बनाया जा सकता है।
जॉन रॉल्स ने अपना सिद्धांत 1971 में प्रकाशित पुस्तक A Theory of Justice में प्रस्तुत किया। अमर्त्य सेन ने अपने विचार 2009 में प्रकाशित पुस्तक The Idea of Justice में प्रस्तुत किए।
सेन का सिद्धांत आंशिक रूप से रॉल्स के सिद्धांत की आलोचना के रूप में विकसित हुआ।
रॉल्स का मानना था कि न्याय कुछ आदर्श सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए जो एक पूर्ण न्यायपूर्ण समाज की संरचना निर्धारित करते हैं।
उन्होंने मूल स्थिति (Original Position) और अज्ञान का आवरण (Veil of Ignorance) की अवधारणा प्रस्तुत की।
रॉल्स के अनुसार यदि लोग अपनी सामाजिक स्थिति को जाने बिना समाज के नियम तय करें, तो वे ऐसे सिद्धांत चुनेंगे जो निष्पक्ष और न्यायपूर्ण हों।
रॉल्स ने न्याय के दो मुख्य सिद्धांत बताए।
पहला सिद्धांत है समान मूलभूत स्वतंत्रता का सिद्धांत।
दूसरा सिद्धांत है अंतर सिद्धांत (Difference Principle), जिसके अनुसार असमानताएँ तभी स्वीकार्य हैं जब वे समाज के सबसे कमजोर लोगों को लाभ पहुँचाएँ।
दूसरी ओर अमर्त्य सेन ने रॉल्स के सिद्धांत के कुछ पहलुओं को स्वीकार किया लेकिन यह कहा कि यह सिद्धांत वास्तविक जीवन की परिस्थितियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता।
सेन के अनुसार न्याय का मूल्यांकन केवल आदर्श संस्थाओं के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि लोगों का जीवन वास्तव में कैसा है।
इसलिए सेन ने क्षमता दृष्टिकोण (Capability Approach) प्रस्तुत किया।
इस सिद्धांत के अनुसार न्याय का मूल्यांकन लोगों की वास्तविक क्षमताओं और अवसरों के आधार पर होना चाहिए।
उदाहरण के लिए यदि सभी लोगों को समान संसाधन दिए जाएँ, तो भी यह आवश्यक नहीं कि सभी को समान अवसर प्राप्त हों।
एक विकलांग व्यक्ति को समान अवसर प्राप्त करने के लिए अधिक संसाधनों की आवश्यकता हो सकती है।
इस प्रकार सेन का सिद्धांत वास्तविक स्वतंत्रता और मानव कल्याण पर अधिक ध्यान देता है।
रॉल्स का दृष्टिकोण आदर्श न्याय व्यवस्था की खोज करता है, जबकि सेन का दृष्टिकोण वास्तविक समाज में अन्याय को कम करने पर केंद्रित है।
दोनों सिद्धांत आधुनिक विधिशास्त्र और राजनीतिक विचारों को प्रभावित करते हैं।