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Discuss American Realism and its contribution.

अमेरिकन रियलिज़्म न्यायशास्त्र (Jurisprudence) का एक महत्वपूर्ण विचारधारा है जो 20वीं सदी के प्रारंभ में संयुक्त राज्य अमेरिका में विकसित हुई। यह विचारधारा मुख्य रूप से 1920 से 1940 के बीच उभरी। इसका विकास पारंपरिक विधिक विचारधारा “लीगल फॉर्मलिज़्म” के विरोध में हुआ।

लीगल फॉर्मलिज़्म का मानना था कि कानून एक पूर्ण, तार्किक और व्यवस्थित नियमों का समूह है। इस विचार के अनुसार न्यायाधीश केवल लिखे हुए नियमों को तथ्यों पर यांत्रिक रूप से लागू करते हैं, जैसे गणित का कोई सूत्र। परंतु अमेरिकन रियलिस्ट इस विचार से सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि कानून केवल पुस्तकों में लिखा हुआ नियम नहीं है, बल्कि वह है जो न्यायालय वास्तव में करते हैं।

अमेरिकन रियलिज़्म का मुख्य सिद्धांत यह है कि कानून स्थिर और कठोर नियमों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक जीवित और परिवर्तनशील प्रणाली है जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों से प्रभावित होती है। न्यायाधीश भी मनुष्य हैं, इसलिए उनके निर्णय केवल कानूनी तर्क पर आधारित नहीं होते, बल्कि उनके अनुभव, पृष्ठभूमि, सोच और सामाजिक वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है।

अमेरिकन रियलिज़्म के प्रमुख प्रवर्तक जस्टिस ओलिवर वेंडेल होम्स जूनियर माने जाते हैं। उन्होंने प्रसिद्ध कथन दिया था – “The life of the law has not been logic; it has been experience.” इसका अर्थ है कि कानून का विकास केवल तर्क से नहीं बल्कि अनुभव से होता है। होम्स के अनुसार कानून वह भविष्यवाणी है कि न्यायालय किसी विशेष परिस्थिति में क्या निर्णय देंगे। इसलिए यदि किसी को कानून को समझना है तो उसे न्यायालयों के वास्तविक निर्णयों का अध्ययन करना चाहिए।

अमेरिकन रियलिज़्म यह मानता है कि न्यायाधीश केवल नियम लागू करने वाली मशीन नहीं हैं। वे मानवीय भावनाओं, सामाजिक प्रभावों और व्यक्तिगत मान्यताओं से प्रभावित होते हैं। इसलिए न्यायिक निर्णय पूरी तरह पूर्वानुमेय (predictable) नहीं होते।

इस विचारधारा के अन्य प्रमुख विद्वान कार्ल लवेलिन, जेरोम फ्रैंक और रोस्को पाउंड थे।

जेरोम फ्रैंक ने “फैक्ट स्केप्टिसिज़्म” (Fact Skepticism) का सिद्धांत दिया। उन्होंने कहा कि न्यायालय का निर्णय तथ्यों पर आधारित होता है, लेकिन तथ्य स्वयं अनिश्चित हो सकते हैं। गवाह झूठ बोल सकते हैं, भूल सकते हैं या घटना को अलग तरीके से देख सकते हैं। न्यायाधीश भी साक्ष्यों की अलग व्याख्या कर सकते हैं। इसलिए कानून में अनिश्चितता मुख्य रूप से तथ्यों की अनिश्चितता के कारण होती है।

कार्ल लवेलिन ने वाणिज्यिक कानून और न्यायालयों के व्यावहारिक कार्य पर जोर दिया। उनका मानना था कि कानून को बदलती हुई आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार ढलना चाहिए। उन्होंने “लॉ इन एक्शन” पर बल दिया, अर्थात कानून वास्तव में कैसे काम करता है।

रोस्को पाउंड ने “Law in Books” और “Law in Action” का अंतर स्पष्ट किया। Law in Books का अर्थ है लिखित कानून। Law in Action का अर्थ है कानून का वास्तविक क्रियान्वयन। अमेरिकन रियलिस्ट का मानना था कि इन दोनों में अंतर होता है और कानून को समझने के लिए Law in Action को देखना आवश्यक है।

अमेरिकन रियलिज़्म का सबसे बड़ा योगदान यह है कि इसने कानून को व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा दी। इसने यह बताया कि न्यायाधीश कानून की रचना में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। कानून केवल संसद द्वारा बनाए गए नियम नहीं हैं, बल्कि न्यायालय की व्याख्या से उसका वास्तविक स्वरूप सामने आता है।

अब यदि हम इसे कंपनी कानून और कंपनी अधिनियम, 2013 के संदर्भ में देखें तो इसकी प्रासंगिकता स्पष्ट हो जाती है।

कंपनी अधिनियम, 2013 में कई ऐसे प्रावधान हैं जिनकी व्याख्या न्यायालयों और न्यायाधिकरणों द्वारा की जाती है।

उदाहरण के लिए, धारा 166 निदेशकों के कर्तव्यों के बारे में बताती है। इसमें कहा गया है कि निदेशक को “सद्भावना” (good faith) से कार्य करना चाहिए। लेकिन “सद्भावना” की परिभाषा अधिनियम में स्पष्ट नहीं है। इसका अर्थ न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार तय करते हैं। यह अमेरिकन रियलिज़्म के सिद्धांत को दर्शाता है कि कानून का अर्थ वास्तविक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

धारा 241 और 242 उत्पीड़न और कुप्रबंधन से संबंधित हैं। यदि अल्पसंख्यक शेयरधारक शिकायत करते हैं, तो एनसीएलटी (NCLT) तथ्यों और परिस्थितियों की जांच करता है। वह केवल तकनीकी नियमों पर नहीं चलता, बल्कि न्याय और निष्पक्षता को ध्यान में रखता है। यह भी रियलिस्ट दृष्टिकोण को दर्शाता है।

बिजनेस जजमेंट रूल भी इसी विचारधारा से संबंधित है। यदि निदेशकों ने ईमानदारी से निर्णय लिया है, तो न्यायालय सामान्यतः उनके व्यावसायिक निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करता। इसका अर्थ है कि कानून व्यावहारिक व्यावसायिक वास्तविकताओं को स्वीकार करता है।

धारा 135 के अंतर्गत कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) भी समाज की बदलती अपेक्षाओं के अनुसार कानून के विकास को दर्शाता है। समाज अब कंपनियों से सामाजिक उत्तरदायित्व की अपेक्षा करता है, और कानून ने इसे मान्यता दी है।

अमेरिकन रियलिज़्म की आलोचना भी हुई है। आलोचकों का कहना है कि यदि कानून न्यायाधीशों की व्यक्तिगत सोच पर अधिक निर्भर हो जाए तो अनिश्चितता बढ़ सकती है। व्यापारिक क्षेत्र को स्थिरता और निश्चितता की आवश्यकता होती है।

फिर भी, अमेरिकन रियलिज़्म का योगदान महत्वपूर्ण है:

• इसने कानून को यथार्थवादी दृष्टिकोण दिया।
• न्यायाधीशों की भूमिका को स्पष्ट किया।
• सामाजिक विज्ञानों को विधि अध्ययन में शामिल किया।
• कानून को लचीला और सामाजिक रूप से उत्तरदायी बनाया।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि अमेरिकन रियलिज़्म न्यायशास्त्र की एक महत्वपूर्ण विचारधारा है जिसने यह सिद्ध किया कि कानून केवल लिखित नियम नहीं बल्कि न्यायालयों के वास्तविक निर्णय हैं। कंपनी कानून के क्षेत्र में भी न्यायिक व्याख्या, निदेशकों के कर्तव्य, उत्पीड़न के मामले और कॉरपोरेट गवर्नेंस के सिद्धांत इस विचारधारा को प्रतिबिंबित करते हैं। इसलिए आधुनिक विधि प्रणाली में अमेरिकन रियलिज़्म अत्यंत प्रासंगिक है।