आधुनिक विधि प्रणाली में प्रथा (Custom) का महत्व
प्रथा कानून का सबसे प्राचीन स्रोत है। जब लिखित कानून नहीं थे, तब समाज अपने व्यवहार को कुछ परंपरागत नियमों के अनुसार चलाता था। ये नियम किसी एक दिन नहीं बने, बल्कि लंबे समय तक लगातार पालन किए जाने से विकसित हुए। जब कोई प्रथा समाज में व्यापक रूप से स्वीकार कर ली जाती है और न्यायालय उसे मान्यता देता है, तब वह विधि का रूप ले लेती है।
आधुनिक विधि प्रणाली में मुख्य स्रोत संविधान, विधान (Statute) और न्यायिक निर्णय (Precedent) हैं। भारत में कंपनी कानून का मुख्य स्रोत कंपनी अधिनियम, 2013 है। फिर भी, आधुनिक समय में भी प्रथा का महत्व समाप्त नहीं हुआ है। यह कानून की व्याख्या, व्यावसायिक व्यवहार और कॉर्पोरेट प्रशासन में सहायक भूमिका निभाती है।
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि प्रथा क्या है।
प्रथा वह व्यवहार है जिसे किसी समुदाय ने लंबे समय तक निरंतर और समान रूप से अपनाया हो, और जिसे समाज कानूनी रूप से बाध्यकारी मानता हो। प्रथा अचानक उत्पन्न नहीं होती। यह धीरे-धीरे विकसित होती है।
प्राचीन समाजों में राजा या सरकार विस्तृत कानून नहीं बनाते थे। विवादों का समाधान स्थानीय रीति-रिवाजों के आधार पर किया जाता था। समय के साथ अनेक प्रथाएँ लिखित कानून में बदल दी गईं। फिर भी कुछ प्रथाएँ आज भी स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में हैं।
आधुनिक विधि प्रणाली में प्रथा का महत्व कई कारणों से है।
पहला, प्रथा कानून की व्याख्या में सहायता करती है। कभी-कभी कानून की भाषा स्पष्ट नहीं होती। ऐसे मामलों में न्यायालय व्यापारिक परंपराओं और स्थापित व्यवहारों को देखते हैं ताकि कानून का सही अर्थ समझा जा सके। कंपनी कानून में कई बार अनुबंधों की व्याख्या उद्योग की प्रथाओं के आधार पर की जाती है।
दूसरा, प्रथा कानून की कमियों को भरती है। कोई भी अधिनियम हर स्थिति को कवर नहीं कर सकता। कंपनी अधिनियम, 2013 बहुत विस्तृत है, फिर भी हर छोटी प्रक्रिया का उल्लेख नहीं करता। ऐसी स्थिति में कंपनियाँ स्थापित व्यावसायिक प्रथाओं का पालन करती हैं।
तीसरा, प्रथा व्यापारिक निश्चितता प्रदान करती है। जब उद्योग में एक समान व्यवहार अपनाया जाता है, तो विवाद कम होते हैं। सभी पक्षों को पता होता है कि उनसे क्या अपेक्षा की जाती है।
चौथा, प्रथा सामाजिक मूल्यों को दर्शाती है। कानून समाज से अलग नहीं है। समाज की स्वीकृति और नैतिकता कानून के विकास को प्रभावित करती है।
पाँचवाँ, प्रथा “न्याय, समानता और सद्विवेक” के सिद्धांत का समर्थन करती है। जब किसी विषय पर कोई स्पष्ट कानून नहीं होता, तो न्यायालय न्यायसंगत निर्णय देने के लिए प्रचलित प्रथाओं को ध्यान में रखता है।
लेकिन हर प्रथा कानूनी रूप से मान्य नहीं होती। किसी प्रथा को मान्यता मिलने के लिए कुछ शर्तें आवश्यक हैं:
वह प्राचीन हो।
वह निरंतर हो।
वह निश्चित हो।
वह उचित और न्यायसंगत हो।
वह सार्वजनिक नीति के विरुद्ध न हो।
वह किसी विधि के विरुद्ध न हो।
यदि कोई प्रथा कानून के विपरीत है, तो कानून ही प्रभावी होगा। कंपनी अधिनियम, 2013 सर्वोच्च है। प्रथा केवल तभी लागू होगी जब वह अधिनियम से टकराती न हो।
कंपनी कानून में प्रथा का प्रभाव निम्न प्रकार से देखा जा सकता है:
बोर्ड की बैठकों की प्रक्रियाएँ अक्सर स्थापित प्रथाओं पर आधारित होती हैं।
शेयरधारकों के अधिकारों की व्याख्या में उद्योग की प्रथाएँ महत्व रखती हैं।
कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मानक समय के साथ विकसित हुई प्रथाओं पर आधारित हैं।
कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (CSR) का विचार भी सामाजिक अपेक्षाओं की प्रथा से विकसित हुआ है। धारा 135 कंपनी अधिनियम, 2013 ने CSR को अनिवार्य बनाया, परंतु समाज में पहले से यह धारणा थी कि कंपनियों को समाज के लिए योगदान देना चाहिए।
इस प्रकार आधुनिक कंपनी कानून में भी प्रथा का अप्रत्यक्ष प्रभाव है।
हालाँकि प्रथा की सीमाएँ भी हैं। यदि कोई प्रथा संविधान के मूल सिद्धांतों जैसे समानता या गरिमा के विरुद्ध है, तो वह अमान्य होगी। अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाली प्रथा स्वीकार नहीं की जा सकती।
अतः प्रथा महत्वपूर्ण है, परंतु वह विधि और संविधान के अधीन है।
निष्कर्षतः, आधुनिक विधि प्रणाली में प्रथा का महत्व इसलिए है क्योंकि वह कानून को सामाजिक वास्तविकता से जोड़ती है। यह व्याख्या में सहायता करती है, कानूनी रिक्त स्थान को भरती है, व्यापारिक निश्चितता प्रदान करती है और न्यायिक विवेक को मजबूत करती है। कंपनी अधिनियम, 2013 के अधीन प्रथा एक सहायक स्रोत के रूप में कार्य करती है।