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Does Volksgeist still matter in globalized legal systems?

क्या वैश्वीकृत विधिक व्यवस्था में Volksgeist आज भी महत्वपूर्ण है?

Volksgeist का विचार फ्रेडरिक कार्ल वॉन सैविनी द्वारा प्रतिपादित किया गया था। वे ऐतिहासिक विधिशास्त्र के प्रमुख विचारक थे। सैविनी के अनुसार कानून अचानक विधायिका द्वारा नहीं बनाया जाता, बल्कि वह समाज की आत्मा, परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामूहिक चेतना से धीरे-धीरे विकसित होता है। इस सामूहिक चेतना को उन्होंने “Volksgeist” अर्थात “जन-आत्मा” कहा।

सैविनी का मत था कि कानून भाषा की तरह स्वाभाविक रूप से विकसित होता है। यदि कानून समाज की संस्कृति और परंपराओं से अलग होकर थोपा जाए, तो वह सफल नहीं होगा। उन्होंने कृत्रिम संहिताकरण (codification) का विरोध किया, यदि वह समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से मेल न खाता हो।

अब प्रश्न उठता है कि आज के वैश्वीकरण के युग में, जब कानून अंतरराष्ट्रीय मानकों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्विक व्यापार से प्रभावित होते हैं, तब क्या Volksgeist का महत्व शेष है?

आज का युग वैश्विक आर्थिक एकीकरण का युग है। अंतरराष्ट्रीय निवेश, विदेशी व्यापार और पूंजी बाजार के कारण विभिन्न देशों के कंपनी कानूनों में समानता बढ़ रही है। कॉरपोरेट गवर्नेंस, लेखांकन मानक, पारदर्शिता, स्वतंत्र निदेशक और ऑडिट समिति जैसी व्यवस्थाएँ लगभग सभी देशों में दिखाई देती हैं।

भारत का कंपनी अधिनियम, 2013 भी वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है। इसमें कॉरपोरेट गवर्नेंस के आधुनिक प्रावधान शामिल हैं। स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति, ऑडिट समिति, प्रकटीकरण मानक आदि अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं से प्रेरित हैं।

लेकिन इसके साथ-साथ भारतीय कानून में भारतीय सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का भी प्रभाव दिखाई देता है।

उदाहरण के लिए धारा 135 के अंतर्गत कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) को अनिवार्य बनाया गया है। यह प्रावधान भारत की सामाजिक और विकासात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है। कई पश्चिमी देशों में CSR को प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन अनिवार्य रूप से लागू नहीं किया जाता। यह भारतीय सामाजिक दर्शन और विकास मॉडल को दर्शाता है। यह Volksgeist का आधुनिक उदाहरण है।

इसी प्रकार धारा 241 और 242 उत्पीड़न और कुप्रबंधन के मामलों में अल्पसंख्यक शेयरधारकों को संरक्षण प्रदान करती हैं। भारत में पारिवारिक स्वामित्व वाली कंपनियाँ अधिक हैं। इसलिए अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान आवश्यक थे। यह भी भारतीय कॉरपोरेट संरचना का प्रतिबिंब है।

वैश्वीकरण का अर्थ यह नहीं है कि सभी देश एक जैसे कानून अपनाएँ। यदि कोई देश विदेशी कानूनों को बिना संशोधन अपनाता है, तो वे स्थानीय परिस्थितियों में असफल हो सकते हैं। कानून को समाज की मानसिकता और आर्थिक संरचना के अनुरूप होना चाहिए।

सैविनी का सिद्धांत आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि कानून की सफलता सामाजिक स्वीकृति पर निर्भर करती है। यदि कानून समाज की संस्कृति से मेल नहीं खाता, तो उसका पालन कम होगा।

हालाँकि, यह भी सत्य है कि पूर्णतः स्थानीय दृष्टिकोण अपनाना संभव नहीं है। वैश्विक व्यापार और निवेश के लिए कानूनी सामंजस्य (harmonization) आवश्यक है। इसलिए आधुनिक विधिक व्यवस्था में एक संतुलन दिखाई देता है—वैश्विक मानकों और राष्ट्रीय आत्मा के बीच संतुलन।

निष्कर्ष:

Volksgeist आज भी महत्वपूर्ण है। भले ही कानून वैश्विक प्रभाव से प्रभावित हों, उनकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे राष्ट्रीय संस्कृति, आर्थिक संरचना और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप हों। कंपनी अधिनियम, 2013 इसका स्पष्ट उदाहरण है, जहाँ वैश्विक मानकों और भारतीय परिस्थितियों का संतुलन दिखाई देता है।