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Explain meaning and classification of Rights.

“अधिकार” विधि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। कंपनी कानून में भी पूरा ढांचा अधिकारों और कर्तव्यों पर आधारित है। यदि अधिकार न हों, तो कंपनी कानून का कोई अर्थ नहीं रह जाता। प्रत्येक शेयरधारक, निदेशक, लेनदार और अन्य हितधारकों को कानून कुछ अधिकार प्रदान करता है। इन अधिकारों को कंपनी अधिनियम, 2013 द्वारा मान्यता दी गई है और यदि उनका उल्लंघन होता है तो न्यायाधिकरण (NCLT) में उपाय उपलब्ध है।

सरल शब्दों में कहा जाए तो:

अधिकार वह विधिक दावा है जिसे कानून मान्यता देता है और जिसकी रक्षा करता है।

अधिकार का अर्थ

अधिकार का अर्थ है – कानून द्वारा संरक्षित दावा या हित। जब कानून किसी व्यक्ति को कुछ करने की अनुमति देता है या किसी अन्य व्यक्ति से कुछ अपेक्षा करने की अनुमति देता है, तो उसे अधिकार कहते हैं।

उदाहरण के लिए:

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 47 के अनुसार प्रत्येक इक्विटी शेयरधारक को मतदान का अधिकार है। यह उसका विधिक अधिकार है। यदि कंपनी उसे मतदान से रोकती है, तो वह न्यायाधिकरण में जा सकता है।

इससे स्पष्ट है कि अधिकार केवल नैतिक अपेक्षा नहीं है, बल्कि विधिक रूप से संरक्षित दावा है।

अधिकार के आवश्यक तत्व

किसी अधिकार के चार मुख्य तत्व होते हैं:

अधिकार रखने वाला व्यक्ति (Right Holder)

कर्तव्य निभाने वाला व्यक्ति (Duty Bearer)

विधिक मान्यता

न्यायालय द्वारा प्रवर्तन (Enforceability)

यदि ये तत्व मौजूद हैं, तभी वह विधिक अधिकार कहलाता है।

कंपनी अधिनियम, 2013 में अधिकार

कंपनी अधिनियम, 2013 विभिन्न प्रकार के अधिकार प्रदान करता है:

• धारा 47 – मतदान का अधिकार
• धारा 94 – रजिस्टर निरीक्षण का अधिकार
• धारा 123 – लाभांश प्राप्त करने का अधिकार
• धारा 136 – वित्तीय विवरण प्राप्त करने का अधिकार
• धारा 241 – उत्पीड़न के विरुद्ध आवेदन का अधिकार

ये सभी अधिकार विधिक रूप से संरक्षित हैं।

अधिकारों का वर्गीकरण

अधिकारों को समझने के लिए उनका वर्गीकरण करना आवश्यक है। मुख्य वर्गीकरण इस प्रकार है:

विधिक और नैतिक अधिकार

सार्वजनिक और निजी अधिकार

सकारात्मक और नकारात्मक अधिकार

स्वामित्व (Proprietary) और व्यक्तिगत अधिकार

पूर्ण और अपूर्ण अधिकार

प्राथमिक और द्वितीयक अधिकार

अब प्रत्येक का सरल भाषा में वर्णन किया जाता है।

1. विधिक और नैतिक अधिकार

विधिक अधिकार वे हैं जिन्हें कानून मान्यता देता है और न्यायालय द्वारा लागू किया जा सकता है।

उदाहरण: मतदान का अधिकार।

नैतिक अधिकार नैतिकता पर आधारित होते हैं। वे न्यायालय में लागू नहीं होते जब तक कि वे कानून में न हों।

2. सार्वजनिक और निजी अधिकार

सार्वजनिक अधिकार पूरे समाज से संबंधित होते हैं।

निजी अधिकार किसी विशेष व्यक्ति से संबंधित होते हैं।

उदाहरण: शेयरधारक का लाभांश पाने का अधिकार एक निजी अधिकार है।

3. सकारात्मक और नकारात्मक अधिकार

सकारात्मक अधिकार में किसी को कुछ करना होता है।

उदाहरण: कंपनी को नोटिस भेजना।

नकारात्मक अधिकार में किसी को कुछ न करने का कर्तव्य होता है।

उदाहरण: निदेशक को कंपनी संपत्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

4. स्वामित्व और व्यक्तिगत अधिकार

स्वामित्व अधिकार संपत्ति से संबंधित होते हैं।

शेयर एक चल संपत्ति है। इसलिए शेयर पर अधिकार स्वामित्व अधिकार है।

व्यक्तिगत अधिकार व्यक्तिगत संबंधों से जुड़े होते हैं।

5. पूर्ण और अपूर्ण अधिकार

पूर्ण अधिकार न्यायालय में लागू किए जा सकते हैं।

अपूर्ण अधिकार लागू नहीं किए जा सकते।

6. प्राथमिक और द्वितीयक अधिकार

प्राथमिक अधिकार स्वतंत्र रूप से मौजूद होते हैं।

द्वितीयक अधिकार तब उत्पन्न होते हैं जब प्राथमिक अधिकार का उल्लंघन हो।

उदाहरण: यदि लाभांश न दिया जाए, तो मुआवज़ा मांगने का अधिकार द्वितीयक अधिकार है।

कंपनी शासन में महत्व

अधिकारों का वर्गीकरण निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है:

• अल्पसंख्यक की रक्षा
• पारदर्शिता सुनिश्चित करना
• शक्ति का संतुलन बनाए रखना
• जवाबदेही बढ़ाना

धारा 241–242 अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा करती है।

निष्कर्ष

अधिकार वह विधिक दावा है जिसे कानून मान्यता देता है। कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के अधिकार दिए गए हैं। इन अधिकारों का वर्गीकरण समझना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इससे उनके स्वरूप और प्रवर्तन को समझा जा सकता है।

अधिकार कंपनी कानून की रीढ़ हैं। इनके बिना कंपनी ढांचा असंतुलित हो जाएगा।