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Explain the revival of Natural Law in modern times.

आधुनिक समय में प्राकृतिक विधि के पुनर्जागरण की व्याख्या कीजिए

प्राकृतिक विधि (Natural Law) विधिशास्त्र का एक प्राचीन सिद्धांत है। इस सिद्धांत का मुख्य विचार यह है कि कानून केवल शासन का आदेश नहीं है, बल्कि उसे न्याय, नैतिकता और तर्क पर आधारित होना चाहिए। प्राकृतिक विधि के अनुसार कुछ ऐसे सार्वभौमिक सिद्धांत होते हैं जो मानव द्वारा बनाए गए कानून से ऊपर होते हैं। ये सिद्धांत प्रकृति, बुद्धि और नैतिकता से उत्पन्न होते हैं।

प्राचीन काल में अरस्तू और सिसरो जैसे दार्शनिकों ने प्राकृतिक विधि का समर्थन किया। मध्यकाल में थॉमस एक्विनास ने इसे धार्मिक आधार से जोड़ा। परंतु उन्नीसवीं शताब्दी में प्राकृतिक विधि का महत्व कम हो गया। इसका कारण विश्लेषणात्मक विचारधारा और विधिक प्रत्यक्षवाद (Legal Positivism) का उदय था। जॉन ऑस्टिन जैसे विचारकों ने कहा कि कानून संप्रभु का आदेश है और उसका नैतिकता से कोई संबंध नहीं है।

बीसवीं शताब्दी में प्राकृतिक विधि का पुनर्जागरण हुआ। इसका मुख्य कारण द्वितीय विश्व युद्ध की घटनाएँ थीं। जर्मनी में नाजी शासन ने कई अमानवीय और अन्यायपूर्ण कानून बनाए। ये कानून संप्रभु द्वारा बनाए गए थे, इसलिए विधिक प्रत्यक्षवाद के अनुसार वैध थे। परंतु वे नैतिक रूप से गलत और अन्यायपूर्ण थे। इससे यह प्रश्न उठा कि क्या केवल संप्रभु द्वारा बनाए जाने से कोई कानून न्यायसंगत हो जाता है?

यहीं से प्राकृतिक विधि का पुनर्जागरण प्रारम्भ हुआ।

आधुनिक प्राकृतिक विधि के प्रमुख विचारकों में लॉन फुलर, रोनाल्ड ड्वॉर्किन और जॉन फिनिस शामिल हैं।

लॉन फुलर ने “कानून की आंतरिक नैतिकता” (Inner Morality of Law) की अवधारणा दी। उन्होंने कहा कि कानून स्पष्ट, संगत और न्यायपूर्ण होना चाहिए। यदि कानून पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है, तो उसे वास्तविक कानून नहीं माना जा सकता।

रोनाल्ड ड्वॉर्किन ने कहा कि कानून केवल नियम नहीं है, बल्कि उसमें नैतिक सिद्धांत भी शामिल होते हैं। न्यायाधीशों को निर्णय करते समय नैतिक सिद्धांतों को ध्यान में रखना चाहिए।

जॉन फिनिस ने कहा कि कानून का उद्देश्य मानव के मूलभूत हितों जैसे जीवन, ज्ञान, और सामाजिक न्याय की रक्षा करना होना चाहिए।

प्राकृतिक विधि के पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण परिणाम मानवाधिकारों का विकास है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (Universal Declaration of Human Rights) स्वीकार की गई। यह घोषणा इस विचार पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति को कुछ अधिकार जन्म से प्राप्त हैं।

भारत का संविधान भी प्राकृतिक विधि के सिद्धांतों को दर्शाता है। संविधान का भाग III (मौलिक अधिकार) न्याय और नैतिकता पर आधारित है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी व्यापक व्याख्या की है और इसमें गरिमा, गोपनीयता और सम्मान का अधिकार भी शामिल किया है।

अब कंपनी अधिनियम, 2013 के संदर्भ में प्राकृतिक विधि के पुनर्जागरण को समझते हैं।

कंपनी कानून केवल तकनीकी नियमों का समूह नहीं है। इसमें नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी महत्व है।

धारा 166 के अनुसार निदेशक को सद्भावना (good faith) से कार्य करना चाहिए। सद्भावना नैतिक कर्तव्य को दर्शाती है।

धारा 135 CSR (Corporate Social Responsibility) को अनिवार्य बनाती है। इसका उद्देश्य समाज के कल्याण को बढ़ावा देना है। यह प्राकृतिक विधि के सिद्धांत से जुड़ा है कि कानून समाज के हित में होना चाहिए।

धारा 241–242 अल्पसंख्यक शेयरधारकों को उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करती है। यह न्याय और निष्पक्षता को सुनिश्चित करती है।

इस प्रकार आधुनिक कंपनी कानून में भी प्राकृतिक विधि के तत्व दिखाई देते हैं।

आलोचना:

कुछ लोग कहते हैं कि प्राकृतिक विधि अस्पष्ट है क्योंकि नैतिकता व्यक्ति-व्यक्ति में अलग हो सकती है। इससे अनिश्चितता उत्पन्न हो सकती है।

परंतु इसके बावजूद प्राकृतिक विधि का पुनर्जागरण यह सुनिश्चित करता है कि कानून केवल शक्ति का उपकरण न बने, बल्कि न्याय और मानव गरिमा की रक्षा करे।

निष्कर्ष:

आधुनिक समय में प्राकृतिक विधि का पुनर्जागरण द्वितीय विश्व युद्ध की घटनाओं के कारण हुआ। इसने यह सिद्ध किया कि कानून को नैतिकता और न्याय से अलग नहीं किया जा सकता। मानवाधिकारों का विकास, संविधान की व्याख्या, और कंपनी कानून में नैतिक उत्तरदायित्व – ये सभी प्राकृतिक विधि के पुनर्जागरण के उदाहरण हैं।