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Is justice subjective?

न्याय (Justice) विधिशास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण विषय है। हर कानूनी व्यवस्था यह दावा करती है कि उसका मुख्य उद्देश्य न्याय प्रदान करना है। न्यायालय अपने निर्णय न्याय के नाम पर देते हैं। संसद और विधानसभाएँ कानून बनाती हैं ताकि समाज में न्याय स्थापित हो सके। लेकिन एक गम्भीर प्रश्न उठता है – क्या न्याय व्यक्तिपरक (Subjective) है? अर्थात् क्या न्याय व्यक्ति की निजी सोच, नैतिकता और विश्वास पर निर्भर करता है, या यह किसी निश्चित और सार्वभौमिक सिद्धांत पर आधारित है?

इस प्रश्न को समझने के लिए पहले यह समझना आवश्यक है कि न्याय क्या है। सामान्य अर्थ में न्याय का अर्थ है निष्पक्षता (Fairness)। इसका मतलब है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित अधिकार दिया जाए। समान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाए और असमान लोगों के साथ उनकी स्थिति के अनुसार व्यवहार किया जाए। परन्तु “निष्पक्षता” का अर्थ भी अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग हो सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी कंपनी में लाभ के बँटवारे को लेकर विवाद हो जाए, तो बहुमत शेयरधारक यह कह सकते हैं कि अधिक शेयर होने के कारण अधिक नियंत्रण उनका अधिकार है। दूसरी ओर, अल्पमत शेयरधारक यह कह सकते हैं कि उन्हें भी निर्णय प्रक्रिया में बराबर भागीदारी मिलनी चाहिए। दोनों पक्ष न्याय की बात करते हैं, लेकिन न्याय की उनकी परिभाषा अलग है। इससे स्पष्ट होता है कि न्याय में व्यक्तिपरक तत्व मौजूद हो सकता है।

व्यक्तिपरक न्याय का अर्थ है ऐसा न्याय जो व्यक्ति की निजी सोच, नैतिक मूल्यों, सामाजिक पृष्ठभूमि और भावनाओं पर आधारित हो। अलग-अलग समाजों में न्याय की अवधारणा अलग हो सकती है। कुछ लोग मानते हैं कि कठोर दंड देना ही न्याय है। कुछ लोग मानते हैं कि सुधार और पुनर्वास ही सच्चा न्याय है। इस प्रकार न्याय का नैतिक दृष्टिकोण व्यक्ति-विशेष पर निर्भर करता है।

लेकिन यदि न्याय केवल व्यक्तिगत विचारों पर निर्भर करे, तो कानूनी व्यवस्था में स्थिरता और निश्चितता नहीं रह सकती। कानून को स्पष्ट और पूर्वानुमान योग्य होना चाहिए। इसलिए विधि व्यवस्था न्याय को वस्तुनिष्ठ (Objective) बनाने का प्रयास करती है। वस्तुनिष्ठ न्याय का अर्थ है ऐसा न्याय जो लिखित कानून, स्थापित नियमों और न्यायिक सिद्धांतों पर आधारित हो।

कंपनी अधिनियम, 2013 इसका उदाहरण है। इस अधिनियम में निदेशकों के कर्तव्यों (Section 166), उत्पीड़न और कुप्रबंधन के विरुद्ध उपाय (Section 241), तथा धोखाधड़ी के लिए दंड (Section 447) का स्पष्ट प्रावधान है। ये प्रावधान सभी कंपनियों पर समान रूप से लागू होते हैं। इससे न्याय को वस्तुनिष्ठ रूप दिया जाता है।

फिर भी, केवल लिखित कानून पर्याप्त नहीं है। न्यायालयों को कानून की व्याख्या करनी पड़ती है। व्याख्या करते समय न्यायाधीश अपने अनुभव, समझ और तर्क का उपयोग करते हैं। इससे नियंत्रित रूप में व्यक्तिपरक तत्व प्रवेश करता है। उदाहरण के लिए, Section 241 में “उत्पीड़न” शब्द का प्रयोग किया गया है, परन्तु इसका कोई गणितीय या निश्चित परिभाषा नहीं दी गई है। न्यायालय परिस्थितियों के आधार पर यह तय करते हैं कि कौन-सा व्यवहार उत्पीड़न है। इस प्रकार न्याय में विवेक और मूल्यांकन शामिल होता है।

संविधान भी न्याय का आधार है। अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इन प्रावधानों से न्याय के वस्तुनिष्ठ मानक स्थापित होते हैं। लेकिन समय के साथ इनकी व्याख्या बदलती रही है। मनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया “न्यायसंगत, निष्पक्ष और युक्तिसंगत” होनी चाहिए। इससे स्पष्ट है कि न्याय का अर्थ समय के साथ विस्तृत होता है।

विधिशास्त्र की विभिन्न विचारधाराएँ भी न्याय को अलग-अलग तरीके से समझाती हैं। प्राकृतिक विधि (Natural Law) के समर्थक मानते हैं कि न्याय सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों पर आधारित है। उनके अनुसार न्याय वस्तुनिष्ठ है क्योंकि यह तर्क और नैतिकता पर आधारित है। विधि प्रत्यक्षवाद (Legal Positivism) के अनुसार न्याय वही है जो वैध कानून कहता है। समाजशास्त्रीय विचारधारा (Sociological School) के अनुसार न्याय समाज की आवश्यकताओं के अनुसार बदलता है। इससे स्पष्ट है कि न्याय की अवधारणा विविध है।

कंपनी कानून में न्याय का उद्देश्य सभी हितधारकों की रक्षा करना है। निदेशक Section 166 के अंतर्गत “सद्भावना” में कार्य करने के लिए बाध्य हैं। लेकिन “सद्भावना” का मूल्यांकन न्यायालय परिस्थितियों के आधार पर करते हैं। यदि निदेशक तकनीकी रूप से नियमों का पालन करे, लेकिन उसका उद्देश्य निजी लाभ हो, तो न्यायालय इसे अन्यायपूर्ण मान सकते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि न्याय केवल कानूनी औपचारिकता नहीं है, बल्कि नैतिक मूल्यांकन भी है।

यदि न्याय पूरी तरह व्यक्तिपरक हो जाए, तो हर न्यायाधीश अपने निजी विचार से निर्णय देगा। इससे असंगति और अनिश्चितता उत्पन्न होगी। इसलिए विधि व्यवस्था वस्तुनिष्ठ ढाँचा प्रदान करती है – जैसे अधिनियम, नियम और पूर्व निर्णय। अनुच्छेद 141 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी हैं। इससे एकरूपता बनी रहती है।

अतः निष्कर्ष यह है कि न्याय पूर्णतः व्यक्तिपरक नहीं है और न ही पूर्णतः वस्तुनिष्ठ है। यह दोनों का संतुलन है। कानून वस्तुनिष्ठ आधार देता है, और न्यायालय विवेक के माध्यम से उसे लागू करते हैं। कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत न्याय सुनिश्चित करने के लिए कानूनी निश्चितता और नैतिक निष्पक्षता दोनों आवश्यक हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि न्याय आंशिक रूप से व्यक्तिपरक है क्योंकि इसमें मूल्य और व्याख्या शामिल है, लेकिन यह कानूनी सिद्धांतों द्वारा नियंत्रित होता है। इसलिए न्याय पूरी तरह निजी राय पर निर्भर नहीं है, बल्कि विधि और नैतिकता के संतुलन पर आधारित है।