आधुनिक युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) तेजी से विकसित हो रही है। आज AI का उपयोग बैंकिंग, शेयर बाजार, चिकित्सा, वाहन संचालन, कॉर्पोरेट प्रबंधन, डेटा विश्लेषण और कानूनी सलाह जैसे क्षेत्रों में किया जा रहा है। AI सिस्टम ऐसे कार्य कर रहे हैं जो पहले केवल मनुष्य कर सकते थे। इसी कारण एक महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न उत्पन्न हुआ है – क्या AI को विधिक व्यक्तित्व दिया जाना चाहिए?
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि विधिक व्यक्तित्व (Legal Personality) क्या होता है। विधिक व्यक्तित्व का अर्थ है कि कानून किसी इकाई को “व्यक्ति” के रूप में मान्यता देता है। ऐसा व्यक्ति अधिकार रख सकता है, कर्तव्य निभा सकता है, संपत्ति का स्वामित्व रख सकता है, अनुबंध कर सकता है और उसके विरुद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है।
कानून में केवल प्राकृतिक व्यक्ति (मनुष्य) ही नहीं, बल्कि कृत्रिम व्यक्ति (Artificial Person) भी होते हैं। उदाहरण के लिए, कंपनी को विधिक व्यक्तित्व प्राप्त होता है। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 9 के अनुसार, कंपनी पंजीकरण के बाद एक अलग विधिक इकाई बन जाती है। प्रसिद्ध निर्णय Salomon v. Salomon & Co. Ltd. में यह सिद्ध किया गया कि कंपनी अपने सदस्यों से अलग एक स्वतंत्र विधिक व्यक्ति है।
लेकिन कंपनी को विधिक व्यक्तित्व इसलिए दिया गया है क्योंकि वह कानून द्वारा स्थापित संस्था है। उसके निदेशक (Directors) और अधिकारी (Officers) होते हैं जो उसके लिए निर्णय लेते हैं। कंपनी की जिम्मेदारी स्पष्ट होती है। यदि धोखाधड़ी होती है तो धारा 447 के अंतर्गत दंड दिया जा सकता है। यदि निदेशक अपने कर्तव्य का उल्लंघन करते हैं तो धारा 166 लागू होती है।
अब प्रश्न है – क्या AI भी ऐसी विधिक इकाई है?
AI एक सॉफ्टवेयर या मशीन प्रणाली है जिसे मनुष्य द्वारा बनाया जाता है। यह डेटा और एल्गोरिद्म के आधार पर निर्णय लेता है। AI के पास न तो चेतना (Consciousness) है, न ही नैतिक समझ (Moral Understanding), न ही स्वतंत्र इच्छा (Free Will)। यह केवल प्रोग्राम के अनुसार कार्य करता है।
कुछ विद्वानों का तर्क है कि अत्यधिक स्वायत्त (Autonomous) AI सिस्टम को सीमित विधिक व्यक्तित्व दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि AI स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकता है और उससे नुकसान होता है, तो उत्तरदायित्व तय करना कठिन हो सकता है। उदाहरण के लिए:
स्वचालित वाहन दुर्घटना कर दे
AI आधारित ट्रेडिंग सिस्टम भारी आर्थिक नुकसान कर दे
AI आधारित चिकित्सा प्रणाली गलत निदान दे दे
ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठता है कि दोष किसका है – प्रोग्रामर का, कंपनी का या AI का?
इन विद्वानों का मत है कि यदि AI को अलग विधिक व्यक्तित्व दिया जाए, तो वह बीमा ले सकता है और उसके माध्यम से क्षतिपूर्ति दी जा सकती है।
लेकिन इसके विरोध में कई मजबूत तर्क हैं।
पहला, विधिक व्यक्तित्व के साथ उत्तरदायित्व (Accountability) जुड़ा होता है। AI में न तो इरादा (Intention) होता है और न ही वह अपराध की मानसिक अवस्था (Mens Rea) बना सकता है। कानून में दंड का उद्देश्य सुधार और नियंत्रण होता है। AI को दंड देना अर्थहीन होगा।
दूसरा, कंपनी अधिनियम, 2013 पहले से ही उत्तरदायित्व तय करता है। यदि कंपनी AI का उपयोग करती है, तो जिम्मेदारी कंपनी और उसके निदेशकों की होगी। धारा 166 निदेशकों को सद्भावना में कार्य करने का दायित्व देती है। धारा 447 धोखाधड़ी के लिए कठोर दंड देती है।
तीसरा, यदि AI को विधिक व्यक्तित्व दिया गया, तो कंपनियाँ अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर सकती हैं। वे कह सकती हैं कि गलती AI की थी। इससे निवेशकों और उपभोक्ताओं की सुरक्षा कमजोर हो जाएगी।
चौथा, विधिक व्यक्तित्व सार्वजनिक हित में दिया जाता है। कंपनी को विधिक व्यक्तित्व आर्थिक विकास के लिए दिया गया। AI को अलग विधिक व्यक्तित्व देने से अधिक भ्रम उत्पन्न हो सकता है।
भारत में वर्तमान कानून AI को विधिक व्यक्ति नहीं मानता। कंपनी अधिनियम, 2013 केवल कंपनियों को विधिक व्यक्तित्व देता है। AI एक उपकरण (Tool) है, न कि विधिक इकाई।
यदि AI आधारित प्रणाली से हानि होती है, तो कंपनी या निर्माता जिम्मेदार होगा। उदाहरण के लिए, यदि AI आधारित वित्तीय सॉफ्टवेयर धोखाधड़ी करता है, तो संबंधित कंपनी और उसके अधिकारी दंडित होंगे।
अतः वर्तमान विधिक ढाँचे में AI को विधिक व्यक्तित्व देने की आवश्यकता नहीं है।
निष्कर्षतः, AI को अभी विधिक व्यक्तित्व नहीं दिया जाना चाहिए। AI में न तो नैतिक क्षमता है, न ही उत्तरदायित्व निभाने की क्षमता। कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत कंपनियाँ और उनके निदेशक AI के कार्यों के लिए जिम्मेदार रहेंगे। AI को नियंत्रित और विनियमित किया जाना चाहिए, लेकिन उसे विधिक व्यक्ति का दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए।