सामाजिक-आर्थिक अधिकारों में शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, आवास और आजीविका जैसे अधिकार शामिल होते हैं। ये एक सम्मानजनक जीवन के लिए आवश्यक हैं।
इस बात पर बहस है कि क्या इन अधिकारों को मौलिक अधिकारों की तरह लागू किया जाना चाहिए।
समर्थक कहते हैं कि बिना इन अधिकारों के स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं है। यदि व्यक्ति भूखा है तो वह अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकता।
भारत में ये अधिकार नीति निदेशक तत्वों में आते हैं, जो सीधे लागू नहीं होते। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 का विस्तार करके कई अधिकार लागू कर दिए हैं।
विरोध करने वाले कहते हैं कि इससे सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।
फिर भी आधुनिक विचार यह है कि ये अधिकार जरूरी हैं और लागू होने चाहिए।
निष्कर्ष में, सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को लागू किया जाना चाहिए।