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What is Kelsen’s Pure Theory of Law?

केल्सन का शुद्ध विधि सिद्धांत (Pure Theory of Law) क्या है?

हांस केल्सन 20वीं सदी के एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधि दार्शनिक थे। उन्होंने “शुद्ध विधि सिद्धांत” (Pure Theory of Law) प्रस्तुत किया। उनका उद्देश्य था कि विधि को एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से समझाया जाए। वे चाहते थे कि विधि का अध्ययन पूरी तरह शुद्ध रूप में किया जाए, अर्थात् विधि को नैतिकता, राजनीति, धर्म, समाजशास्त्र या मनोविज्ञान से अलग करके समझा जाए।

इसलिए उन्होंने अपने सिद्धांत को “शुद्ध” कहा। शुद्ध का अर्थ है कि विधि को केवल विधि के रूप में समझना, न कि यह देखना कि वह न्यायसंगत है या अन्यायपूर्ण।

केल्सन के अनुसार, विधि आदेश (command) नहीं है, बल्कि विधि एक “मानदंडों की प्रणाली” (system of norms) है। मानदंड (norm) वह नियम है जो यह बताता है कि क्या किया जाना चाहिए। विधि “क्या है” (is) नहीं बताती, बल्कि “क्या होना चाहिए” (ought) बताती है।

उदाहरण के लिए, यदि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 166 कहती है कि निदेशक को सद्भावना से कार्य करना चाहिए, तो यह कोई तथ्य नहीं बता रही है, बल्कि एक कर्तव्य निर्धारित कर रही है। यह एक विधिक मानदंड है।

विधि एक मानदंडों की श्रेणी (Hierarchy of Norms)

केल्सन ने कहा कि विधि एक पिरामिड के रूप में व्यवस्थित होती है। हर निम्न स्तर का नियम अपनी वैधता (validity) उच्च स्तर के नियम से प्राप्त करता है।

यह संरचना इस प्रकार है:

मूल मानदंड (Grundnorm)

संविधान

संसद द्वारा बनाए गए कानून (जैसे कंपनी अधिनियम, 2013)

नियम और विनियम

आदेश और निर्णय

यदि कोई निम्न स्तर का नियम उच्च स्तर के नियम के विपरीत है, तो वह अमान्य हो जाता है।

उदाहरण:

यदि कंपनी अधिनियम का कोई प्रावधान संविधान के विपरीत है, तो अनुच्छेद 13 के अनुसार वह शून्य हो जाएगा।

ग्रुंडनॉर्म (Grundnorm) क्या है?

ग्रुंडनॉर्म का अर्थ है “मूल मानदंड” या “बेसिक नॉर्म”।

यह कोई लिखित नियम नहीं है। यह एक अनुमानित (presupposed) मानदंड है। यह मान लिया जाता है कि “संविधान का पालन किया जाना चाहिए।”

संविधान अपनी वैधता इसी मूल मानदंड से प्राप्त करता है। संसद अपनी शक्ति संविधान से प्राप्त करती है। कंपनी अधिनियम संसद की शक्ति से बनता है। इस प्रकार वैधता ऊपर से नीचे आती है।

विधि और नैतिकता का अलगाव

केल्सन ने कहा कि विधि और नैतिकता अलग हैं। कोई कानून नैतिक रूप से गलत हो सकता है, लेकिन यदि वह संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार बनाया गया है, तो वह विधिक रूप से वैध है।

भारत में भी विधि की वैधता संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करती है।

कंपनी अधिनियम में प्रयोग

कंपनी अधिनियम, 2013 संसद द्वारा बनाया गया है। संसद को यह शक्ति संविधान से प्राप्त है। इसलिए कंपनी अधिनियम की धाराएँ वैध हैं।

उदाहरण:

धारा 447 – धोखाधड़ी के लिए दंड

धारा 166 – निदेशकों के कर्तव्य

इनकी वैधता संविधान से प्राप्त होती है।

महत्व

विधि की वैज्ञानिक व्याख्या

संविधान की सर्वोच्चता

न्यायिक समीक्षा का आधार

विधिक संरचना की स्पष्टता

विधि की वैधता का सिद्धांत

आलोचना

ग्रुंडनॉर्म काल्पनिक है।

नैतिकता की अनदेखी करता है।

बहुत सैद्धांतिक है।

सामाजिक वास्तविकता को कम महत्व देता है।

निष्कर्ष

केल्सन का शुद्ध विधि सिद्धांत विधि को एक मानदंडों की श्रेणी के रूप में समझाता है, जहाँ प्रत्येक नियम अपनी वैधता उच्च नियम से प्राप्त करता है और अंततः मूल मानदंड (Grundnorm) से।

भारत में संविधान सर्वोच्च मानदंड है, और कंपनी अधिनियम, 2013 उसकी शक्ति से वैध है।