ऑस्टिन के संप्रभुता सिद्धांत का समालोचनात्मक परीक्षण
जॉन ऑस्टिन विश्लेषणात्मक विचारधारा के प्रमुख प्रवर्तक थे। उनका संप्रभुता सिद्धांत विधिक प्रत्यक्षवाद (Legal Positivism) का आधार है। ऑस्टिन के अनुसार कानून संप्रभु का आदेश है जो दंड से समर्थित होता है। इसलिए कानून को समझने के लिए पहले संप्रभुता को समझना आवश्यक है।
ऑस्टिन के अनुसार संप्रभु वह निश्चित (determinate) मानव श्रेष्ठ है जिसे समाज का अधिकांश भाग आदतन (habitually) मानता और obey करता है, और जो स्वयं किसी अन्य श्रेष्ठ की आज्ञा का पालन आदतन नहीं करता। सरल शब्दों में, संप्रभु वह सर्वोच्च सत्ता है जिसे लोग नियमित रूप से मानते हैं और जो किसी अन्य के अधीन नहीं है।
ऑस्टिन के संप्रभुता सिद्धांत के तीन मुख्य तत्व हैं:
संप्रभु निश्चित मानव श्रेष्ठ होना चाहिए।
संप्रभु को समाज का अधिकांश भाग आदतन मानता हो।
संप्रभु स्वयं किसी अन्य की आदतन आज्ञा का पालन न करता हो।
ऑस्टिन का मानना था कि संप्रभुता पूर्ण (absolute), अविभाज्य (indivisible) और असीमित (unlimited) होती है। संप्रभु के अधिकार पर कोई कानूनी सीमा नहीं होती। संप्रभु स्वयं अपने बनाए हुए कानून से कानूनी रूप से बंधा नहीं होता।
ऑस्टिन ने कानून को नैतिकता से अलग किया। उनके अनुसार कानून अच्छा है या बुरा, इससे उसकी वैधता प्रभावित नहीं होती। यदि कानून संप्रभु द्वारा बनाया गया है और दंड से समर्थित है, तो वह वैध है।
अब इस सिद्धांत की आलोचनात्मक परीक्षा करते हैं।
पहली आलोचना – संवैधानिक सीमाओं की अनदेखी
आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में संप्रभुता पूर्ण नहीं होती। भारत में संविधान सर्वोच्च है। अनुच्छेद 13 के अनुसार जो भी कानून मौलिक अधिकारों के विरुद्ध होगा, वह शून्य होगा। इसका अर्थ है कि संसद की शक्ति सीमित है।
ऑस्टिन का सिद्धांत संवैधानिक सर्वोच्चता को समझाने में असफल है।
दूसरी आलोचना – संघीय संरचना
भारत एक संघीय राज्य है जहाँ शक्तियाँ केंद्र और राज्यों में विभाजित हैं। कोई एक संस्था पूर्ण संप्रभु नहीं है। इसलिए संप्रभुता अविभाज्य नहीं है।
तीसरी आलोचना – लोकतंत्र में जनसत्ता
लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है। सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और हटाई जा सकती है। इसलिए संप्रभु एक निश्चित मानव श्रेष्ठ नहीं है।
चौथी आलोचना – अंतरराष्ट्रीय कानून
ऑस्टिन ने अंतरराष्ट्रीय कानून को वास्तविक कानून नहीं माना क्योंकि उसके ऊपर कोई संप्रभु नहीं है। परंतु आज अंतरराष्ट्रीय कानून को मान्यता प्राप्त है और उसका पालन किया जाता है।
पाँचवीं आलोचना – न्यायिक पुनरीक्षण
भारत में न्यायपालिका को न्यायिक पुनरीक्षण का अधिकार है। वह संसद द्वारा बनाए गए कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकती है। इससे स्पष्ट है कि संप्रभुता सीमित है।
अब कंपनी अधिनियम, 2013 के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता देखते हैं।
कंपनी अधिनियम, 2013 संसद द्वारा बनाया गया है। ऑस्टिन के दृष्टिकोण से संसद संप्रभु है। अधिनियम इसलिए वैध है क्योंकि यह संप्रभु का आदेश है और दंड से समर्थित है।
उदाहरण के लिए, धारा 166 निदेशकों के कर्तव्यों को निर्धारित करती है। यदि निदेशक इनका उल्लंघन करते हैं, तो दंड मिल सकता है। यह ऑस्टिन के सिद्धांत के अनुरूप है।
धारा 135 CSR को अनिवार्य बनाती है। यह भी संप्रभु का आदेश है।
परंतु संसद स्वयं संविधान से बंधी है। यदि कोई प्रावधान संविधान के विरुद्ध है, तो न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है।
इस प्रकार ऑस्टिन का सिद्धांत कानून की औपचारिक वैधता को समझाता है, परंतु आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था को पूर्ण रूप से नहीं समझा पाता।
निष्कर्षतः, ऑस्टिन का संप्रभुता सिद्धांत स्पष्ट और सरल है। यह कानून की वैधता का आधार बताता है। परंतु यह आधुनिक लोकतांत्रिक और संघीय व्यवस्थाओं में सीमित और अधूरा सिद्ध होता है। इसलिए यह ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, परंतु पूर्णतः संतोषजनक नहीं है।