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Explain theories of Rights.

प्रस्तावना

“अधिकार” विधि का मूल और केंद्रीय सिद्धांत है। बिना अधिकार के कोई भी विधिक व्यवस्था पूर्ण नहीं हो सकती। कंपनी कानून में भी अधिकारों का विशेष महत्व है क्योंकि कंपनी अधिनियम, 2013 विभिन्न व्यक्तियों जैसे शेयरधारक, निदेशक, लेनदार और अन्य हितधारकों को अनेक अधिकार प्रदान करता है। लेकिन अधिकार का वास्तविक अर्थ और उसका दार्शनिक आधार समझने के लिए हमें विभिन्न सिद्धांतों का अध्ययन करना आवश्यक है।

विभिन्न विधि विद्वानों (jurists) ने अधिकारों की प्रकृति और उत्पत्ति को समझाने के लिए अलग-अलग सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। इन सिद्धांतों को अधिकारों के सिद्धांत (Theories of Rights) कहा जाता है।

मुख्य सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत

विधिक या प्रत्यक्षवाद (Positivist) सिद्धांत

ऐतिहासिक सिद्धांत

सामाजिक कल्याण सिद्धांत

हित सिद्धांत

इच्छा सिद्धांत

अब प्रत्येक सिद्धांत को सरल भाषा में समझते हैं और कंपनी कानून से उसका संबंध स्थापित करते हैं।

1. प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत (Natural Rights Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार अधिकार मनुष्य को जन्म से प्राप्त होते हैं। वे राज्य या कानून द्वारा निर्मित नहीं होते, बल्कि स्वाभाविक रूप से मौजूद होते हैं। कानून केवल इन अधिकारों को मान्यता देता है और उनकी रक्षा करता है।

उदाहरण के लिए जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार प्राकृतिक अधिकार माने जाते हैं।

लेकिन कंपनी कानून में अधिकांश अधिकार प्राकृतिक नहीं बल्कि वैधानिक (statutory) होते हैं। जैसे मतदान का अधिकार धारा 47 के अंतर्गत दिया गया है। यह जन्म से प्राप्त अधिकार नहीं है, बल्कि कंपनी अधिनियम द्वारा प्रदान किया गया है।

इसलिए कंपनी कानून में प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत की सीमित भूमिका है। फिर भी न्याय, निष्पक्षता और पारदर्शिता के सिद्धांत इस विचार से प्रभावित हैं।

2. विधिक या प्रत्यक्षवाद सिद्धांत (Legal/Positivist Theory)

यह सिद्धांत कहता है कि अधिकार केवल वही हैं जिन्हें कानून मान्यता देता है। यदि कानून किसी अधिकार को मान्यता नहीं देता, तो वह विधिक अधिकार नहीं है।

कंपनी कानून में यह सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उदाहरण:

• धारा 47 – मतदान का अधिकार
• धारा 136 – वित्तीय विवरण प्राप्त करने का अधिकार
• धारा 241 – उत्पीड़न के विरुद्ध आवेदन का अधिकार

ये सभी अधिकार इसलिए अस्तित्व में हैं क्योंकि कंपनी अधिनियम, 2013 इन्हें प्रदान करता है। यदि कानून में संशोधन हो जाए, तो अधिकार भी बदल सकते हैं।

इसलिए कंपनी कानून मुख्य रूप से विधिक सिद्धांत पर आधारित है।

3. ऐतिहासिक सिद्धांत (Historical Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार अधिकार समय के साथ विकसित होते हैं। वे अचानक उत्पन्न नहीं होते बल्कि सामाजिक परंपराओं और रीति-रिवाजों से विकसित होते हैं।

कंपनी कानून का इतिहास देखें तो यह व्यापारिक प्रथाओं और साझेदारी सिद्धांतों से विकसित हुआ है। अल्पसंख्यक शेयरधारकों की सुरक्षा का अधिकार भी ऐतिहासिक रूप से बहुमत द्वारा शक्ति के दुरुपयोग के कारण विकसित हुआ।

इस प्रकार कंपनी कानून के कई अधिकार ऐतिहासिक विकास का परिणाम हैं।

4. सामाजिक कल्याण सिद्धांत (Social Welfare Theory)

यह सिद्धांत कहता है कि अधिकार समाज के कल्याण के लिए दिए जाते हैं। कानून अधिकार इसलिए प्रदान करता है ताकि सामाजिक व्यवस्था और आर्थिक स्थिरता बनी रहे।

कंपनी कानून में अधिकार केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं होते, बल्कि व्यापक आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए होते हैं।

उदाहरण:

• दस्तावेज़ों का निरीक्षण करने का अधिकार – पारदर्शिता सुनिश्चित करता है।
• उत्पीड़न के विरुद्ध आवेदन का अधिकार – निष्पक्षता सुनिश्चित करता है।

इस प्रकार अधिकार सामाजिक और आर्थिक संतुलन बनाए रखने का साधन हैं।

5. हित सिद्धांत (Interest Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार अधिकार वह हित है जिसे कानून द्वारा संरक्षित किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति का कोई महत्वपूर्ण हित है और कानून उसे सुरक्षा प्रदान करता है, तो वह अधिकार बन जाता है।

शेयरधारकों का कंपनी के लाभ में आर्थिक हित होता है। इस हित की रक्षा के लिए कानून लाभांश का अधिकार देता है।

इसी प्रकार मतदान का अधिकार शेयरधारकों के प्रबंधन संबंधी हित की रक्षा करता है।

कंपनी कानून में यह सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि अधिकांश अधिकार आर्थिक हितों की रक्षा करते हैं।

6. इच्छा सिद्धांत (Will Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार अधिकार व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति के कर्तव्य पर नियंत्रण करने की शक्ति देता है। अधिकार का उद्देश्य व्यक्ति की इच्छा (will) को लागू करना है।

उदाहरण:

मतदान का अधिकार शेयरधारक को कंपनी के निर्णयों पर प्रभाव डालने की शक्ति देता है। वह अपनी इच्छा के अनुसार मतदान कर सकता है।

इस प्रकार कंपनी कानून में मतदान और प्रबंधन से जुड़े अधिकार इच्छा सिद्धांत को दर्शाते हैं।

कंपनी कानून में सिद्धांतों की प्रासंगिकता

कंपनी अधिनियम, 2013 में अधिकार मुख्य रूप से वैधानिक हैं। इसलिए विधिक सिद्धांत सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। साथ ही हित सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकार आर्थिक और प्रबंधन हितों की रक्षा करते हैं।

सामाजिक कल्याण सिद्धांत कॉर्पोरेट गवर्नेंस के उद्देश्य को स्पष्ट करता है।

ऐतिहासिक सिद्धांत अधिकारों के विकास को समझाता है।

प्राकृतिक सिद्धांत की भूमिका सीमित है।

महत्व

अधिकारों के सिद्धांतों का अध्ययन निम्नलिखित कारणों से आवश्यक है:

• अधिकारों की प्रकृति समझने के लिए
• कंपनी अधिनियम की व्याख्या करने के लिए
• अल्पसंख्यक संरक्षण को समझने के लिए
• कॉर्पोरेट शासन को मजबूत करने के लिए

निष्कर्ष

अधिकारों के विभिन्न सिद्धांत हमें यह समझने में सहायता करते हैं कि अधिकार क्यों अस्तित्व में हैं और उनका उद्देश्य क्या है। कंपनी कानून में अधिकार मुख्य रूप से वैधानिक हैं और हितों की रक्षा करते हैं। इसलिए विधिक और हित सिद्धांत सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।

कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत अधिकार न्यायाधिकरण द्वारा लागू किए जा सकते हैं। इस प्रकार अधिकार कंपनी कानून की आधारशिला हैं।