संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का अर्थ है कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है बल्कि यह स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और न्याय जैसे मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है।
संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है कि राज्य की सभी संस्थाएँ संविधान के मूल सिद्धांतों और मूल्यों के अनुसार कार्य करें।
यह अवधारणा भारतीय संवैधानिक कानून में विशेष रूप से नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) मामले के बाद प्रमुख हुई।
मामले की पृष्ठभूमि
भारतीय दंड संहिता की धारा 377 “अप्राकृतिक अपराधों” को अपराध घोषित करती थी।
इस धारा के कारण सहमति से होने वाले समलैंगिक संबंध भी अपराध माने जाते थे।
2009 में नाज़ फाउंडेशन बनाम दिल्ली सरकार मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने धारा 377 को आंशिक रूप से असंवैधानिक घोषित किया।
लेकिन 2013 में सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय को पलट दिया।
बाद में नवतेज सिंह जौहर सहित कई लोगों ने धारा 377 को पुनः चुनौती दी।
न्यायालय का निर्णय
2018 में सर्वोच्च न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने निर्णय दिया कि वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक संबंध अपराध नहीं हैं।
संवैधानिक नैतिकता का महत्व
न्यायालय ने कहा कि समाज की बहुसंख्यक नैतिकता संविधान से ऊपर नहीं हो सकती।
संविधान का उद्देश्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना है।
इस प्रकार न्यायालय ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता सामाजिक पूर्वाग्रहों से अधिक महत्वपूर्ण है।