यदि एक नई कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली न्यायिक निर्णय देने लगे, तो यथार्थवादी दृष्टिकोण से उसका मूल्यांकन आवश्यक होगा। विधिक यथार्थवाद (Legal Realism) का सिद्धांत यह कहता है कि कानून केवल किताबों में लिखे नियम नहीं है, बल्कि न्यायालय वास्तव में क्या करते हैं वही वास्तविक कानून है।
यथार्थवादी मानते हैं कि न्यायाधीश केवल नियम लागू नहीं करते, बल्कि वे सामाजिक परिस्थितियों, आर्थिक वास्तविकताओं और मानवीय व्यवहार से प्रभावित होते हैं। यदि AI प्रणाली निर्णय देगी, तो वह डेटा और एल्गोरिथ्म के आधार पर निर्णय देगी। लेकिन न्याय करना केवल गणितीय प्रक्रिया नहीं है।
कंपनियाँ अधिनियम, 2013 की धारा 241 और 242 उत्पीड़न और कुप्रबंधन से संबंधित हैं। यहाँ अधिकरण को यह देखना होता है कि क्या कंपनी का संचालन अल्पसंख्यक शेयरधारकों के लिए अन्यायपूर्ण है। यह निर्णय केवल दस्तावेज देखकर नहीं लिया जा सकता। इसमें नीयत, विश्वास और निष्पक्षता का मूल्यांकन करना पड़ता है।
धारा 271 में “न्यायसंगत और उचित” आधार पर कंपनी का समापन किया जा सकता है। यह शब्द लचीला है। AI इस शब्द की गहराई को पूरी तरह समझ नहीं सकता।
यथार्थवादी यह भी कहेंगे कि AI पिछले डेटा पर आधारित है। यदि पुराने निर्णय पक्षपातपूर्ण थे, तो AI वही पक्षपात दोहराएगा। कानून सामाजिक शक्ति संरचना को दर्शाता है। इसलिए AI असमानता को मजबूत कर सकता है।
हालाँकि, यदि AI देरी कम करे, भ्रष्टाचार घटाए और एकरूपता लाए, तो यथार्थवादी इसे सहायक उपकरण के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। लेकिन वे मानव न्यायाधीश का पूर्ण प्रतिस्थापन स्वीकार नहीं करेंगे।
निष्कर्षतः, यथार्थवादी दृष्टिकोण से न्याय एक जीवंत प्रक्रिया है। इसे केवल कोड में नहीं बदला जा सकता।