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Is Natural Law superior to Positive Law?

प्राकृतिक कानून और सकारात्मक कानून के बीच श्रेष्ठता का प्रश्न विधिशास्त्र की सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण बहसों में से एक है। यह कानून की मूल प्रकृति और न्याय की अवधारणा से जुड़ा हुआ है। इस प्रश्न का सही उत्तर देने के लिए पहले यह समझना आवश्यक है कि प्राकृतिक कानून और सकारात्मक कानून क्या हैं।

प्राकृतिक कानून नैतिकता, न्याय, निष्पक्षता और तर्क पर आधारित है। यह कहता है कि कानून को नैतिक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। अरस्तू, थॉमस एक्विनास और अन्य विचारकों के अनुसार कुछ ऐसे सार्वभौमिक न्याय सिद्धांत हैं जो हर समय और हर स्थान पर लागू होते हैं। ये सिद्धांत सरकार या संसद पर निर्भर नहीं होते। ये प्रकृति, तर्क या ईश्वर की व्यवस्था से उत्पन्न होते हैं।

सकारात्मक कानून वह कानून है जिसे विधायिका या संप्रभु प्राधिकारी बनाता है। इसमें संसद द्वारा बनाए गए अधिनियम, नियम और विनियम शामिल हैं। यह आवश्यक नहीं कि यह नैतिकता पर आधारित हो। यह उचित प्राधिकारी और प्रक्रिया पर आधारित होता है। जॉन ऑस्टिन के अनुसार कानून संप्रभु का आदेश है जो दंड से समर्थित होता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के समय नाजी जर्मनी में ऐसे कानून बनाए गए जो कानूनी रूप से वैध थे लेकिन नैतिक रूप से गलत थे। युद्ध के बाद न्यायालयों ने कहा कि केवल वैध रूप से बनाया गया कानून पर्याप्त नहीं है, वह न्यायसंगत भी होना चाहिए। इससे प्राकृतिक कानून का पुनर्जागरण हुआ।

अब प्रश्न यह है कि क्या प्राकृतिक कानून सकारात्मक कानून से श्रेष्ठ है?

प्राकृतिक कानून न्याय पर जोर देता है। यदि कोई कानून अन्यायपूर्ण है, तो उसे वास्तविक कानून नहीं माना जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण मानव अधिकारों और गरिमा की रक्षा करता है।

भारत के संविधान में मौलिक अधिकार प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित हैं। संसद संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती। यह विचार प्राकृतिक कानून से प्रभावित है।

दूसरी ओर, सकारात्मक कानून निश्चितता और स्थिरता प्रदान करता है। समाज केवल नैतिक विचारों पर नहीं चल सकता। स्पष्ट लिखित कानून आवश्यक हैं।

कंपनी अधिनियम, 2013 में कंपनी गठन, निदेशकों के कर्तव्य और दंड के स्पष्ट प्रावधान हैं। इससे व्यावसायिक लेन-देन में स्थिरता आती है।

यदि केवल प्राकृतिक कानून पर निर्भर किया जाए तो भ्रम उत्पन्न हो सकता है। अलग-अलग लोगों की नैतिकता अलग हो सकती है।

यदि केवल सकारात्मक कानून पर निर्भर किया जाए तो अन्याय हो सकता है।

धारा 166 निदेशकों को “सद्भावना” में कार्य करने का निर्देश देती है। यह नैतिक अवधारणा है।

धारा 447 धोखाधड़ी के लिए दंड प्रदान करती है। यह स्पष्ट सकारात्मक कानून है।

इससे स्पष्ट है कि आधुनिक कानूनी प्रणाली दोनों को मिलाकर चलती है।

केशवानंद भारती (1973) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत स्थापित किया। यह प्राकृतिक कानून से प्रभावित है।

मनेका गांधी (1978) मामले में न्यायालय ने प्रक्रिया को न्यायसंगत और उचित बताया। यह भी प्राकृतिक न्याय का प्रभाव है।

निष्कर्ष:

प्राकृतिक कानून नैतिक दृष्टि से श्रेष्ठ है क्योंकि यह न्याय और मानव गरिमा की रक्षा करता है। लेकिन सकारात्मक कानून व्यावहारिक दृष्टि से आवश्यक है क्योंकि यह व्यवस्था और निश्चितता प्रदान करता है। आधुनिक कानूनी व्यवस्था में दोनों का संतुलन आवश्यक है।