राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत व्यापक शक्तियाँ दी गई हैं ताकि यह मानव अधिकारों की प्रभावी रक्षा कर सके। ये शक्तियाँ मुख्य रूप से सिफारिशात्मक (recommendatory) होती हैं, लेकिन इनका प्रभाव काफी मजबूत होता है।
सबसे पहले, NHRC को मानव अधिकार उल्लंघन की शिकायतों की जांच करने का अधिकार है। यह शिकायत पीड़ित व्यक्ति द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जा सकती है, या आयोग स्वयं संज्ञान (सुओ मोटू) लेकर भी जांच शुरू कर सकता है।
दूसरा, जांच के दौरान NHRC के पास सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ होती हैं, जैसे गवाहों को बुलाना, शपथ पर बयान लेना, साक्ष्य एकत्र करना और सरकारी दस्तावेज मांगना।
तीसरा, NHRC जेलों, निरोध केंद्रों और मानसिक संस्थानों का निरीक्षण कर सकता है और वहाँ की स्थिति सुधारने के सुझाव दे सकता है।
चौथा, यह मानव अधिकार मामलों में न्यायालय की अनुमति से हस्तक्षेप कर सकता है।
पाँचवाँ, यह मानव अधिकारों से संबंधित संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा कर सकता है।
छठा, यह पीड़ितों को मुआवजा देने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है।
लेकिन इसकी एक सीमा यह है कि इसके निर्णय बाध्यकारी नहीं होते।
सरल अर्थ (Hindi):
NHRC जांच करता है, सुझाव देता है, लेकिन सरकार को मजबूर नहीं कर सकता।