“एक ऐसा कानून जो विधिक रूप से वैध है पर नैतिक रूप से अन्यायपूर्ण है — क्या उसका पालन किया जाना चाहिए?”
यह प्रश्न विधि और नैतिकता के संबंध से जुड़ा हुआ है। यह एक महत्वपूर्ण न्यायशास्त्रीय प्रश्न है कि यदि कोई कानून विधिक रूप से वैध है, क्योंकि उसे संविधान के अनुसार विधायिका द्वारा पारित किया गया है, लेकिन वह नैतिक दृष्टि से अन्यायपूर्ण या अनुचित प्रतीत होता है, तो क्या नागरिकों को उसका पालन करना चाहिए?
सबसे पहले हमें “विधिक रूप से वैध” और “नैतिक रूप से अन्यायपूर्ण” का अर्थ समझना होगा।
कोई कानून विधिक रूप से वैध तब होता है जब वह सक्षम विधायिका द्वारा संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पारित किया गया हो। भारत में संसद और राज्य विधानसभाएँ कानून बनाती हैं। यदि कानून विधायी शक्ति के अंतर्गत बनाया गया है और संविधान के प्रावधानों का पालन करता है, तो वह विधिक रूप से वैध माना जाएगा।
नैतिक रूप से अन्यायपूर्ण कानून वह है जो लोगों को अनुचित, कठोर, भेदभावपूर्ण या मानव गरिमा के विरुद्ध प्रतीत होता है।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब विधिक वैधता और नैतिकता में टकराव हो जाता है।
कंपनी कानून के संदर्भ में, कंपनी अधिनियम, 2013 कंपनियों के संचालन का मुख्य कानून है। यदि कोई प्रावधान विधिक रूप से वैध है, तो कंपनी और उसके निदेशकों को उसका पालन करना होता है, चाहे कुछ लोग उसे नैतिक रूप से कठोर या अनुचित मानें।
इस विषय पर विभिन्न विचारधाराएँ हैं।
पहला दृष्टिकोण – विधि सकारात्मकता (Legal Positivism)
इस सिद्धांत के अनुसार विधि और नैतिकता अलग-अलग हैं। किसी कानून की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि वह सही प्रक्रिया से बनाया गया है या नहीं, न कि वह नैतिक रूप से सही है या नहीं।
यदि हर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत नैतिक मान्यता के आधार पर कानून का पालन करने या न करने का निर्णय लेने लगे, तो समाज में अराजकता फैल जाएगी। इसलिए विधिक रूप से वैध कानून का पालन आवश्यक है।
कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत निदेशकों पर कई कर्तव्य लगाए गए हैं। यदि कोई निदेशक यह कहे कि वह किसी प्रावधान का पालन नहीं करेगा क्योंकि वह उसे नैतिक रूप से अनुचित मानता है, तो यह कॉर्पोरेट अनुशासन को कमजोर करेगा।
इसलिए विधिक स्थिरता के लिए वैध कानून का पालन आवश्यक है।
दूसरा दृष्टिकोण – प्राकृतिक विधि सिद्धांत (Natural Law Theory)
इस सिद्धांत के अनुसार कानून को नैतिक सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। यदि कोई कानून गंभीर रूप से अन्यायपूर्ण है, तो वह नैतिक अधिकार खो देता है।
परंतु आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र में समाधान सीधा अवज्ञा करना नहीं है। नागरिकों के पास न्यायालय में कानून को चुनौती देने का अधिकार है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 के अनुसार यदि कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो वह शून्य हो जाएगा।
इस प्रकार भारत में नैतिकता का संरक्षण संविधान और न्यायिक समीक्षा के माध्यम से होता है।
आधुनिक भारतीय स्थिति
भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है। यहाँ विधि सर्वोच्च है, परंतु संविधान उससे भी ऊपर है। यदि कोई कानून नैतिक रूप से अन्यायपूर्ण है और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
लेकिन जब तक न्यायालय ऐसा न करे, तब तक वह कानून बाध्यकारी रहेगा।
कंपनी कानून के संदर्भ में
कंपनी अधिनियम, 2013 के कई प्रावधान कठोर प्रतीत हो सकते हैं। उदाहरण के लिए:
CSR का दायित्व
धोखाधड़ी के लिए कठोर दंड
निदेशकों की अयोग्यता
कुछ लोग इन्हें नैतिक रूप से कठोर मान सकते हैं। परंतु जब तक वे संविधान के अनुरूप हैं, उनका पालन करना आवश्यक है।
विधि का शासन (Rule of Law)
विधि का शासन का अर्थ है कि सभी व्यक्ति कानून के अधीन हैं। यदि लोग अपनी व्यक्तिगत नैतिकता के आधार पर कानून की अवहेलना करने लगें, तो विधि व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।
सिविल अवज्ञा
कुछ ऐतिहासिक परिस्थितियों में लोगों ने अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण विरोध किया। परंतु सिविल अवज्ञा में व्यक्ति कानूनी परिणाम स्वीकार करता है। यह नैतिक विरोध है, कानूनी अस्वीकार नहीं।
निष्कर्ष
भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में विधिक रूप से वैध कानून का पालन किया जाना चाहिए। यदि वह नैतिक रूप से अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है, तो उसे न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए। व्यक्तिगत अवज्ञा समाधान नहीं है।
अतः विधिक रूप से वैध कानून का पालन अनिवार्य है, जब तक कि उसे न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित न किया जाए।