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Explain Historical School.

ऐतिहासिक विधि शाला (Historical School) क्या है?

ऐतिहासिक विधि शाला विधिशास्त्र की एक महत्वपूर्ण विचारधारा है। इसका विकास 19वीं शताब्दी में हुआ। यह विचारधारा प्राकृतिक विधि शाला (Natural Law School) और विश्लेषणात्मक विधि शाला (Analytical School) के विरोध में सामने आई।

इस शाला का मुख्य सिद्धांत यह है कि कानून अचानक किसी शासक द्वारा नहीं बनाया जाता और न ही केवल तर्क से खोजा जाता है। बल्कि कानून धीरे-धीरे समाज के रीति-रिवाजों, परंपराओं, संस्कृति और ऐतिहासिक विकास से उत्पन्न होता है।

इस शाला के अनुसार कानून एक पौधे की तरह विकसित होता है। इसे किसी कारखाने में तैयार नहीं किया जाता। यह समाज के जीवन से उत्पन्न होता है और समाज के साथ-साथ बढ़ता है।

प्रमुख प्रवर्तक – फ्रेडरिक कार्ल वॉन साविनी

ऐतिहासिक शाला के मुख्य समर्थक फ्रेडरिक कार्ल वॉन साविनी थे। उन्होंने कहा कि कानून “Volksgeist” का परिणाम है। Volksgeist का अर्थ है “जनता की आत्मा” या “जन भावना”।

साविनी के अनुसार हर राष्ट्र की अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपरा और मानसिकता होती है। कानून उसी सामूहिक चेतना का प्रतिबिंब होता है। इसलिए कानून को समझने के लिए उस समाज के इतिहास को समझना आवश्यक है।

उन्होंने यह भी कहा कि कानून को जल्दबाजी में संहिताबद्ध (Codify) नहीं करना चाहिए। यदि कानून को बिना ऐतिहासिक आधार के लिखा जाएगा तो वह प्रभावी नहीं होगा।

कानून के विकास के तीन चरण

साविनी के अनुसार कानून तीन चरणों में विकसित होता है:

प्रथागत चरण (Customary Stage)

विद्वत चरण (Scholarly Stage)

संहिताबद्ध चरण (Codification Stage)

पहले चरण में लोग परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। धीरे-धीरे ये प्रथाएँ बाध्यकारी नियम बन जाती हैं।

दूसरे चरण में विधिवेत्ता (Jurists) इन प्रथाओं का अध्ययन करते हैं और उन्हें व्यवस्थित करते हैं।

तीसरे चरण में कानून को लिखित रूप दिया जाता है।

सर हेनरी मेन का योगदान

सर हेनरी मेन ने कहा कि कानून “Status से Contract” की ओर बढ़ा है। प्राचीन समाज में व्यक्ति की कानूनी स्थिति उसके जन्म और सामाजिक दर्जे पर निर्भर करती थी। आधुनिक समाज में अधिकार और कर्तव्य अनुबंध (Contract) पर आधारित हैं।

यह सिद्धांत कंपनी कानून में स्पष्ट दिखाई देता है। कंपनी में शेयरधारक, निदेशक और सदस्य अनुबंध के आधार पर जुड़े होते हैं।

कंपनी अधिनियम, 2013 से संबंध

कंपनी अधिनियम, 2013 अचानक नहीं बना। इससे पहले कंपनी अधिनियम, 1956 था। उससे पहले ब्रिटिश कंपनी कानून लागू था। इसका अर्थ है कि कंपनी कानून भी ऐतिहासिक विकास का परिणाम है।

उदाहरण:

पृथक कानूनी व्यक्तित्व (Separate Legal Personality) का सिद्धांत पहले न्यायालयों द्वारा विकसित हुआ।

बाद में इसे विधि में शामिल किया गया।

कॉर्पोरेट गवर्नेंस के नियम भी व्यापारिक प्रथाओं से विकसित हुए।

इससे स्पष्ट होता है कि कंपनी कानून भी ऐतिहासिक शाला के सिद्धांत को दर्शाता है।

ऐतिहासिक शाला का महत्व

कानून की उत्पत्ति को समझाती है।

कानून को संस्कृति से जोड़ती है।

परंपराओं का सम्मान करती है।

क्रमिक सुधार को बढ़ावा देती है।

कानून को समाज के अनुकूल बनाती है।

आलोचना

यह बहुत अधिक परंपरावादी है।

तेजी से सुधार का विरोध करती है।

पुरानी कुप्रथाओं को भी बचा सकती है।

सामाजिक क्रांति को समर्थन नहीं देती।

निष्कर्ष

ऐतिहासिक शाला हमें सिखाती है कि कानून समाज के इतिहास से विकसित होता है। कंपनी कानून भी लंबे ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। इसलिए कानून को समझने के लिए उसके इतिहास को समझना आवश्यक है।