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Is law what judges say it is? (American Realism)

यह कथन “कानून वही है जो न्यायाधीश कहते हैं” अमेरिकी यथार्थवाद (American Realism) से जुड़ा हुआ है। अमेरिकी यथार्थवाद 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अमेरिका में विकसित हुआ। इसके प्रमुख विचारक ओलिवर वेंडेल होम्स जूनियर, जेरोम फ्रैंक और कार्ल लेवेलिन थे। इन विचारकों ने पारंपरिक विधिक सिद्धांतों का विरोध किया और कहा कि वास्तविक कानून वह है जो न्यायालय वास्तव में निर्णय देते हैं।

होम्स ने कहा था, “कानून का जीवन तर्क नहीं बल्कि अनुभव रहा है।” उनका अर्थ था कि कानून केवल लिखित नियमों का समूह नहीं है, बल्कि न्यायालयों द्वारा वास्तविक मामलों में दिए गए निर्णयों से समझा जाना चाहिए।

अमेरिकी यथार्थवादियों का मानना था कि कानून को केवल विधि-पुस्तकों में नहीं, बल्कि न्यायालयों की कार्यवाही में देखना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति यह जानना चाहता है कि कानून क्या है, तो उसे यह देखना चाहिए कि न्यायालय किस प्रकार निर्णय देते हैं।

यह विचार पारंपरिक औपचारिकवाद (Formalism) के विरुद्ध था। औपचारिकवाद के अनुसार न्यायाधीश केवल नियमों को तार्किक रूप से लागू करते हैं। लेकिन यथार्थवादियों ने कहा कि न्यायाधीशों के निर्णय सामाजिक परिस्थितियों, आर्थिक कारकों और व्यक्तिगत अनुभवों से प्रभावित होते हैं।

अब प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में कानून वही है जो न्यायाधीश कहते हैं?

पहले हमें समझना होगा कि यथार्थवादियों का आशय क्या था।

उनका अर्थ यह नहीं था कि न्यायाधीश मनमानी करते हैं। उनका कहना था कि लिखित कानून तब तक प्रभावी नहीं होता जब तक उसे न्यायालय व्याख्यायित और लागू नहीं करते।

उदाहरण के लिए कंपनी अधिनियम, 2013 में कई प्रावधान व्यापक और सामान्य शब्दों में लिखे गए हैं। जैसे “उत्पीड़न” (Oppression), “कुप्रबंधन” (Mismanagement), “सद्भावना” (Good Faith), “उचित सावधानी” (Reasonable Care) आदि। इन शब्दों की सटीक व्याख्या न्यायालयों द्वारा की जाती है।

धारा 241 उत्पीड़न और कुप्रबंधन से संबंधित है। कानून यह नहीं बताता कि कौन-सा आचरण उत्पीड़न माना जाएगा। यह न्यायालय तय करते हैं।

इसी प्रकार धारा 166 निदेशकों के कर्तव्यों को निर्धारित करती है। लेकिन “सद्भावना” का क्या अर्थ है, यह न्यायालय ही स्पष्ट करते हैं।

इस प्रकार व्यावहारिक अर्थ में कानून न्यायिक व्याख्या से आकार लेता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कानून केवल न्यायाधीशों की इच्छा है। न्यायाधीश संविधान और विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों से बंधे होते हैं।

यदि कंपनी अधिनियम में स्पष्ट रूप से दंड का प्रावधान है, तो न्यायालय उसे समाप्त नहीं कर सकते। वे केवल उसकी सीमा और अर्थ स्पष्ट कर सकते हैं।

अतः अमेरिकी यथार्थवाद कानून के व्यावहारिक पहलू को उजागर करता है। यह बताता है कि कानून का वास्तविक स्वरूप न्यायालयों के निर्णयों से निर्धारित होता है।

लेकिन कानून केवल न्यायिक निर्णय नहीं है। यह विधायिका द्वारा बनाए गए कानून, संविधान के सिद्धांत और न्यायिक व्याख्या का संयुक्त परिणाम है।

निष्कर्ष:

कानून केवल वही नहीं है जो न्यायाधीश कहते हैं, लेकिन न्यायाधीशों की भूमिका कानून के वास्तविक अर्थ और प्रभाव को निर्धारित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। कंपनी अधिनियम, 2013 में भी न्यायिक व्याख्या के बिना कई प्रावधान अस्पष्ट रह जाते। इसलिए अमेरिकी यथार्थवाद आंशिक रूप से सही है, पर पूर्ण सत्य नहीं है।