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Is sovereignty obsolete in globalization?

संप्रभुता (Sovereignty) राजनीति और विधिशास्त्र की एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। संप्रभुता का अर्थ है राज्य की सर्वोच्च शक्ति, जिसके द्वारा वह बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के अपने देश का शासन कर सकता है। एक संप्रभु राज्य के पास कानून बनाने, उन्हें लागू करने, न्याय देने और आंतरिक एवं बाहरी नीतियाँ निर्धारित करने का पूर्ण अधिकार होता है। पारंपरिक रूप से संप्रभुता को पूर्ण, अविभाज्य और असीमित शक्ति माना जाता था। लेकिन आधुनिक वैश्वीकरण (Globalization) के युग में इस अवधारणा पर प्रश्न उठाए जाने लगे हैं। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या वैश्वीकरण के कारण संप्रभुता अप्रासंगिक या समाप्त हो गई है?

इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले यह समझना आवश्यक है कि संप्रभुता का वास्तविक अर्थ क्या है। सरल शब्दों में संप्रभुता का अर्थ है सर्वोच्च अधिकार। यदि कोई राज्य किसी अन्य राज्य के नियंत्रण में नहीं है और अपने निर्णय स्वयं लेता है, तो वह संप्रभु है। भारत के संविधान की प्रस्तावना में भारत को “सार्वभौम” अर्थात् संप्रभु राष्ट्र कहा गया है। इसका अर्थ है कि भारत अपनी आंतरिक और बाहरी नीतियों को स्वतंत्र रूप से निर्धारित करता है।

वैश्वीकरण का अर्थ है देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी और सांस्कृतिक संबंधों का बढ़ना। आज देश एक-दूसरे से व्यापार करते हैं, अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सदस्य बनते हैं, संधियाँ करते हैं और जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद तथा वित्तीय संकट जैसे वैश्विक मुद्दों पर सहयोग करते हैं। इस बढ़ती परस्पर निर्भरता के कारण कुछ विद्वानों का मत है कि संप्रभुता कमजोर हो गई है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई देश विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का पालन करना पड़ता है। इसी प्रकार बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (Multinational Corporations) कई देशों में कार्य करती हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि राज्य की शक्ति सीमित हो रही है।

परंतु यह समझना आवश्यक है कि कोई भी राज्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में स्वेच्छा से शामिल होता है। भारत जब किसी संधि पर हस्ताक्षर करता है, तो वह संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार करता है। उसे कोई बाहरी शक्ति मजबूर नहीं करती। इसलिए यह संप्रभुता का त्याग नहीं, बल्कि उसका प्रयोग है। आज संप्रभुता का स्वरूप सहयोगात्मक (cooperative) हो गया है।

कंपनी कानून के संदर्भ में देखें तो वैश्वीकरण ने कॉर्पोरेट प्रशासन (Corporate Governance) को प्रभावित किया है। कंपनी अधिनियम, 2013 में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) की व्यवस्था धारा 135 में की गई है। स्वतंत्र निदेशक (Independent Director) की अवधारणा भी वैश्विक मानकों से प्रेरित है। लेकिन ये प्रावधान भारतीय संसद द्वारा बनाए गए हैं। इसका अर्थ है कि भारत ने अपनी संप्रभु विधायी शक्ति का उपयोग करते हुए वैश्विक मानकों को अपनाया है।

यदि कोई विदेशी कंपनी भारत में व्यापार करती है, तो उसे भारतीय कानूनों का पालन करना होता है। कंपनी अधिनियम की धारा 2(42) विदेशी कंपनी की परिभाषा देती है। धारा 379 से 393 तक विदेशी कंपनियों पर भारतीय कानून लागू होता है। धारा 447 के अंतर्गत धोखाधड़ी के लिए दंड का प्रावधान है। इससे स्पष्ट है कि भारत अपनी सीमा के भीतर कार्य करने वाली सभी कंपनियों को नियंत्रित करने का अधिकार रखता है।

कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि आर्थिक वैश्वीकरण के कारण सरकारें अंतरराष्ट्रीय पूंजी के दबाव में कानून बदलती हैं। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद कानून बनाती है और न्यायालय उनकी व्याख्या करते हैं। संविधान सर्वोच्च है। अनुच्छेद 245 संसद को पूरे भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है। यह संप्रभु विधायी शक्ति का प्रमाण है।

संप्रभुता आज पूर्ण अलगाव (Isolation) का नाम नहीं है। यह सहयोगात्मक भागीदारी (Cooperative Participation) का रूप ले चुकी है। राज्य वैश्विक संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य करते हैं, लेकिन अंतिम अधिकार उनके पास ही रहता है।

अतः यह कहना गलत होगा कि वैश्वीकरण के कारण संप्रभुता अप्रासंगिक हो गई है। संप्रभुता समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उसका स्वरूप परिवर्तित हुआ है। आज संप्रभुता का अर्थ है वैश्विक व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना।

निष्कर्षतः, संप्रभुता वैश्वीकरण के युग में भी प्रासंगिक है। यह कमजोर नहीं हुई है, बल्कि विकसित हुई है। कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत भारत अपनी संप्रभु शक्ति का प्रयोग करते हुए घरेलू और विदेशी दोनों कंपनियों को नियंत्रित करता है। इसलिए संप्रभुता अप्रासंगिक नहीं है, बल्कि आधुनिक परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित है।